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    जैन धर्म का इतिहास | 1

    जैन धर्म

    हेलो दोस्तों आपका INDIA TODAY ONE blog में स्वागत है। इस लेख हम जैन धर्म के बारे में जानेंगे। छठी सदी के उत्तरार्ध में मध्य गंगा के मैदानों में अनेक धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ इस युग में करीब 62 धार्मिक संप्रदायों का उदय हुआ। इनमें जैन संप्रदाय और बौद्ध संप्रदाय सबसे महत्वपूर्ण थे। हम जानेंगे की किन कारणों से जैन धर्म का उद्भव हुआ। तथा कोन थे जैन धर्म के संस्थापक। और क्यों जैन धर्म के 24 तिर्थकरों में से महावीर स्वामी का इतना महत्व है।

    जैन धर्म

    जैन धर्म

    • जैन शब्द संस्कृत के ”जिन” शब्द से बना है। जिसका अर्थ “विजेता” होता है। अर्थात जिन्होंने अपने मन, वाणी तथा काया को जीत लिया हो।
    • महावीर के पहले 23 और आचार्य हुए हैं |  जो ”तीर्थंकर” कहलाते  थे ।
    • जैन अनुश्रुचियों और परंपराओं के अनुसार जैन धर्म के 24 तीर्थंकर हुए परंतु इनमें से पहले 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिक संदिग्ध है।
    • Jain Dharm की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ”ऋषभदेव या आदिनाथ” को जाता है। जिन्होंने छठी शताब्दी ईसा पूर्व जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर)अरिष्ठनेमी (22वें तीर्थंकर) का उल्लेख ”ऋग्वेद” में मिलता है।
    • Jain Dharm के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। जो काशी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका काल महावीर से 250 ईसा पूर्व माना जाता है। इनके अनुयायियों को “निग्रंथ” कहा जाता था ।
    • पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रत इस प्रकार है। {सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह (धन संचय का त्याग), असत्य (चोरी ना करना) }
    • पार्श्वनाथ ने नारियों को भी अपने धर्म में प्रवेश दिया क्योंकि जैन ग्रंथ में स्त्री संघ की अध्यक्ष ”पुष्पचूला” का उल्लेख मिलता है।
    • पार्श्वनाथ को झारखंड के गिरिडीह जिले में “सम्मेद पर्वत” पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
    • Jain Dharm के वास्तविक संस्थापक 24 वें अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
    • महावीर ने अपने जीवन काल में ही एक संघ की स्थापना की जिसमें 11 अनुयायी सम्मिलित थे। ये “गणधर” कहलाए।
    • Jain Dharm पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करता था उनके अनुसार कर्मफल ही जन्म तथा मृत्यु का कारण है।
    • Jain Dharm में युद्ध और कृषि दोनों  वर्जित है। क्योंकि दोनों में जीवो की हिंसा होती है।
    • आरंभ में Jain Dharm में मूर्ति पूजा का प्रचलन नहीं था। किंतु बाद में महावीर सहित सभी पूर्व तीर्थकरों की मूर्ति पूजा आरंभ हो गई।
    • Jain Dharm पुनजन्म व कर्मवाद में विश्वास करता है। यह वेद की अपौरूषेयता तथा ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करता है।

    महावीर स्वामी का जीवन परिचय।

    जैन धर्म

    जीवन परिचय :-

    जन्म[599ईं.पू. या 540ईं.पू.] में कुंडग्राम (वैशाली) बिहार।
    पिता सिद्धार्थ (वज्जि संघ के ज्ञातृक कुल के प्रधान )
    मातात्रिशला  (लिच्छवी शासक चेटक की बहन)
    पत्नीयशोदा (कुंडिय गोत्र की कन्या)
    पुत्री प्रियदर्शा (अर्णाज्जा)
    दामादजामाली
    गृह त्याग30 वर्ष की आयु में बड़े भाई नंदी वर्धन की आज्ञा से
    शिष्यमक्खलिपुत्रघोषाल
    ज्ञान प्राप्ति (केवल्य)12 वर्ष की तपस्या के पश्चात 42 वर्ष की आयु में जृम्भिक ग्राम में “ऋजुपालिका” नदी के तट पर “साल” वृक्ष के नीचे।
    निर्वाण (मृत्यु) 527ईं.पू.अथवा 468ईं.पू. पावापुरी (वर्तमान राजगिरी के समीप) में मल्ल राजा सुस्तपाल के यहां।

    जैन धर्म के सिद्धांत अर्थात् उपदेश एवं शिक्षा।

    1. पंच महाव्रत / अणुव्रत अर्थात् नियम  :-

    जैन धर्म

    पंच महाव्रत :-

    अहिंसाजीव की हिंसा या हत्या ना करना
    अमृषा झूठ न बोलना
    अचौर्यचोरी न करना
    अपरिग्रहसंपत्ति इकट्ठा ना करना
    ब्रह्मचर्य  इंद्रियों को वश में करना

    Note :-

    • Jain Dharm में युद्ध और कृषि दोनों वर्जित है क्योंकि दोनों में जीवो की हिंसा होती है फलस्वरूप जैन धर्म लंबियाओं में व्यापार और वाणिज्य करने वालो की संख्या अधिक हो गई।
    • महावीर के पूर्व तीर्थकर पार्श्व ने तो अपने अनुयायियों को निचले और ऊपरी अंगों को वस्त्र से ढकने की अनुमति दी थी। पर महावीर ने वस्त्र का सर्वथा त्याग करने का आदेश दिया इसका आशय यह था कि वह अपने अनुयायियों के जीवन में और भी अधिक संयम लाना चाहते थे। इसके चलते बाद में जैन धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया श्वेतांबर अर्थात् सफेद वस्त्र धारण करने वाले और दिगंबर अर्थात नगन  रहने वाले।

    2. जैन धर्म में 10 लक्षण बताए गए हैं।

    जैन धर्म

    जैन धर्म के लक्षण :-

    उत्तम क्षमाक्रोध हीनता।
    उत्तम मार्दवअहंकार का अभाव।
    उत्तम मार्जवसरलता एवं कुटिलता का अभाव।
    उत्तम सोचसांसारिक बंधनों से आत्मा को परे रखने की सोच।
    उत्तम सत्यसत्य से गंभीर अनुरक्ति।
    उत्तम संयमसदा संयमित जीवन यापन।
    उत्तम तपजीवन को आजीवन से मुक्त करने के लिए कठोर तपस्या।
    उत्तम अकिंचनआत्मा के संभावित गुणों में आस्था।
    उत्तम ब्रह्मचर्यब्रह्मचर्य व्रत का कड़ाई से अनुपालन।
    उत्तम त्यागत्याग की भावना सर्वप्रिय रखना।

    3. जैन धर्म के त्रिरत्न अर्थात तीन जोहर।

    जैन धर्म

    जैन धर्म के त्रिरत्न

    • Jain Dharm में मुख्यतः सांसारिक बंधनों से छुटकारा पाने के उपाय बताए गए हैं ऐसा छुटकारा या मोक्ष पाने के लिए कर्मकांड अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है यह तीनों Jain Dharm के त्रिरत्न या तीन जोहर माने जाते हैं।
    सम्यक् दर्शनवास्तविक ज्ञान
    सम्यक् ज्ञान सत्य में विश्वास
    सम्यक् आचरणसांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुख के प्रति समभाव

    4. जैन धर्म के ज्ञान।

    जैन धर्म

    ज्ञान :-

    मति  इंद्रिय जनित ज्ञान।
    श्रुतिश्रवण ज्ञान।
    अवधिदिव्य ज्ञान।
    मन: पर्यायदूसरे के मन को जान लेना।
    केवल्यसर्वोच्च ज्ञान।

    5. केवल्य।

    • जब जीव से कर्म का अवशेष बिल्कुल समाप्त हो चुका है तथा वह मोक्ष की प्राप्ति (केवल्य)  कर लेता है।
    • जैन धर्म के सिर्फ संघ के सदस्यों के लिए  केवल्य का नियम है सामान्य जन के लिए नहीं सामान्य जन या गृहस्थो को भिक्षु जीवन मै प्रवेश करने से पूर्व 11 कोठियों से होकर गुजरना पड़ता है।
    • महावीर स्वामी को केवल्य की प्राप्ति हो जाने के बाद ही केवलिन, जिन (विजेता), अर्ह (योग्य), निग्रंथ (बंधन रहित) जैसी उपाधियां मिली है।

    6. अनंत चतुष्टय।

    • जब जीव  से कर्म का अवशेष बिल्कुल समाप्त हो जाता है। तब वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। मोक्ष के पश्चात जीवन के आवागमन के चक्कर से मुक्ति मिल जाती है। तथा वह अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य या अनंत सुख की प्राप्ति कर लेता है। इसे ही जैन शास्त्रों में अनंत चतुष्टय की संज्ञा दी गई है।

    जैन संगीतियां।

    प्रथम सभा :-

    स्थलपाटलिपुत्र
    अध्यक्षस्थूलभद्र
    कार्य जैन ग्रंथों के 12 अंगों का संकलन हुआ।

    द्वितीय सभा :-

    स्थान वल्लभी (गुजरात)
    अध्यक्षदेनाधिक्षमाश्रमण
    कार्य जैन ग्रंथों का अर्धमगधी प्राकृत भाषा में संकलन हुआ

    जैन धर्म का प्रसार।

    • Jain Dharm के उपदेशों के प्रचार – प्रसार के लिए महावीर ने अपने अनुयायियों का संघ बनाया जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को सम्मान स्थान मिला।
    • Jain Dharm में अपने को ब्राह्मण धर्म से स्पष्ट:  पृथक नहीं किया इसलिए वह लोगों को अधिक संख्या में  आकृष्ट करने में असफल रहा।
    • एक  परवर्ती परंपरा के अनुसार कर्नाटक में जैन धर्म का प्रचार सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ( 322 – 298 ईसा पूर्व) ने किया उन्होंने जैन धर्म को अपना लिया।
    • दक्षिण भारत में Jain Dharm के फैलने का दूसरा कारण यह बताया जाता है कि महावीर के निर्वाण के 200 वर्ष बाद मगध में भारी अकाल पड़ा। यह अकाल 12 वर्षों इस समय Jain Dharm दो संप्रदायों में विभक्त हो गया।
    1. दिगंबर       :-  बहुत से जैन बहुभद्र के नेतृत्व में प्राण बचाने के लिए दक्षिण पथ चले गए। यह दिगंबर  कहलाए। इन प्रवासी जैनो ने दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रचार किया।
    2. श्वेतांबर      :-  (सफेद वस्त्र धारण करने वाले) जैन लोग स्थूलबहू  के नेतृत्व में मगध में ही रह गए।

    जैन धर्म का योगदान।

    • Jain Dharm में ही सबसे पहले वर्ण व्यवस्था और वैदिक कर्मकांड की बुराइयों को रोकने के लिए गंभीर प्रयास किए।
    • आरंभ में जैनों ने मुख्य ब्राह्मणों द्वारा संपोषित संस्कृत भाषा का परित्याग किया और अपने धर्मपदेश के लिए आम लोगों की बोलचाल की प्रकृत भाषा को अपनाया  उसके धार्मिक ग्रंथ अर्धमगधी भाषा में लिखे गए हैं। और यह ग्रंथ ईसा की छठी सदी में गुजरात में वल्लभ नामक स्थान में जो एक महान विद्या केंद्र था अंतिम रूप से संकलित किए गए।
    • Jain Dharm के अहिंसा पर अत्यधिक बल देने के कारण इसके अनुयायी कृषि तथा युद्ध के संलन्ग ना होकर व्यापार एवं वाणिज्य को महत्व देते थे। जिससे व्यापार – वाणिज्य की उन्नति हुई तथा नगरों की स्थापना बड़ी।
    • जनता को Jain Dharm की सीधी एवं सरल उपदेशों ने आकर्षित किया तथा उत्तर वैदिक कालीन कर्मकांड यह जटिल विचारधारा के सम्मुख Jain Dharm के रूप में जीवन यापन का सीधा साधा मार्ग प्रस्तुत किया।

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    FAQ

    Ques 1. जैन धर्म के संस्थापक कौन है।
    Ans. जैन धर्म की स्थापना :-

    • जैन धर्म की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ”ऋषभदेव या आदिनाथ” को जाता है। जिन्होंने छठी शताब्दी ईसा पूर्व जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर)अरिष्ठनेमी (22वें तीर्थंकर) का उल्लेख ”ऋग्वेद” में मिलता है।
    • जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24 वें अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।

    Ques 2. जैन धर्म में कितने तीर्थंकर थे?
    Ans. जैन धर्म के तीर्थंकर :-

    • जैन अनुश्रुचियों और परंपराओं के अनुसार जैन धर्म के 24 तीर्थंकर हुए परंतु इनमें से पहले 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिक संदिग्ध है।
    • जैन धर्म की स्थापना का श्रेय जैनियों के प्रथम तीर्थंकर ”ऋषभदेव या आदिनाथ” को जाता है। जिन्होंने छठी शताब्दी ईसा पूर्व जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर)अरिष्ठनेमी (22वें तीर्थंकर) का उल्लेख ”ऋग्वेद” में मिलता है।
    • जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। जो काशी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे।
    • जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24 वें अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।

    Ques 3. जैन धर्म के त्रिरत्न कोनसे है?
    Ans. जैन धर्म के त्रिरत्न :-

    • जैन धर्म में मुख्यतः सांसारिक बंधनों से छुटकारा पाने के उपाय बताए गए हैं ऐसा छुटकारा या मोक्ष पाने के लिए कर्मकांड अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है यह तीनों जैन धर्म के त्रिरत्न या तीन जोहर माने जाते हैं।
    1. सम्यक् दर्शन     :- वास्तविक ज्ञान
    2. सम्यक् ज्ञान      :- सत्य में विश्वास
    3. सम्यक् आचरण :- सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुख के प्रति समभाव

    Ques 5. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे
    Ans. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। जो काशी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका काल महावीर से 250 ईसा पूर्व माना जाता है। इनके अनुयायियों को “निग्रंथ” कहा जाता था ।

    Ques 5. जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर कौन थे
    Ans. जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24 वें अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।

    Ques 6. जैन धर्म के पंच महाव्रत क्या है?
    Ans.
    पंच महाव्रत :-

    1. अहिंसा     :-  जीव की हिंसा या हत्या ना करना
    2. अमृषा      :-  झूठ न बोलना
    3. अचौर्य      :- चोरी न करना
    4. अपरिग्रह   :-  संपत्ति इकट्ठा ना करना
    5. ब्रह्मचर्य     :-  इंद्रियों को वश में करना

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