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    सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास – UPSC Hindi Notes | 1

    सिंधु घाटी सभ्यता

    हेलो दोस्तों आपका INDIA TODAY ONE blog में स्वागत है। इस लेख में हम सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में विस्तार से जानेंगे। सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता कांस्य युगीन सभ्यता थी। जिसका उद्भव ताम्र पाषाण काल में भारत के पश्चिमी क्षेत्र में हुआ था और इसका विस्तार भारत के अलावा पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान में कुछ क्षैत्र में भी था।

    Table of Contents

    सिंधु घाटी सभ्यता

    सिंधु घाटी सभ्यता के खोजकर्त्ता

    • सर्वप्रथम चार्ल्स मैनस ने 1826 ई. में सिंधु सभ्यता का पता लगाएं जिसका सर्वप्रथम वर्णन उसके द्वारा 1842 में उनकी प्रकाशित पुस्तक मिलता है। 
    • उसके बाद वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर जॉन्स मार्शल के नेतृत्व में पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने उत्खनन कर इसके प्रमुख नगर हड़प्पा का पता लगाया सर्वप्रथम हड़प्पा स्थल की खोज के कारण इसका नाम “हड़प्पा सभ्यता” रखा गया।
    • यह सभ्यता 400 से 500 वर्षों तक विद्यमान रही तथा 2200ईं.पू. से 2000ईं.पू के मध्य तक यह अपनी परिपक्व अवस्था में थी। नवीन शोध के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8000 साल पुरानी।

    सिंधु घाटी सभ्यता का भौगोलिक विस्तार (क्षेत्रफल)

    सिंधु घाटी सभ्यता

    भौगोलिक विस्तार :-

    • सिंधु सभ्यता का भौगोलिक विस्तार पूर्व आलमगीरपुर (मेरठ) से लेकर पश्चिमी में अफगानिस्तान ( सुत्कागेंडोर) तक तथा उत्तर में मांडा (जम्मू ) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक था।
    • वह उत्तर से दक्षिण तक लगभग 1100 किलोमीटर तक तथा पूर्व से पश्चिम 1600 किलोमीटर तक फैली हुई थी अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।
    • सिंधु घाटी सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार है। जिसका क्षेत्रफल लगभग 1300000 वर्ग किलोमीटर।

    सिंधु घाटी सभ्यता के चरण

    सिंधु घाटी सभ्यता के कालखंड के निर्धारण को लेकर विभिन्न विद्वानों के बीच गंभीर मतभेद हैं। विद्वानों ने सिंधु घाटी सभ्यता को तीन चरणों में विभक्त किया है, ये हैं

    1.प्रारंभिक हड़प्पा संस्कृति अथवा प्राक् हड़प्पा संस्कृति (3200 ई.पू.से 2600 ई.पू.)
    2.हड़प्पा सभ्यता अथवा परिपक्व हड़प्पा सभ्यता (2600 ई.पू. से 1900 ई.पू.)
    3.उत्तरवर्ती हड़प्पा संस्कृति अथवा परवर्ती हड़प्पा संस्कृति (1900 ई.पू. से 1300 ई.पू.)

    1. प्रारंभिक हड़प्पा संस्कृति अथवा प्राक् हड़प्पा संस्कृति 3200 ई.पू. से 2600 ई.पू.)

    • प्रारंभिक हड़प्पाई चरण ‘हाकरा चरण’ से संबंधित है, जिसे घग्गर- हाकरा नदी घाटी में चिह्नित किया गया है।
    • हड़प्पाई लिपि का प्रथम उदाहरण लगभग 3000 ई.पू के समय का मिलता है।
    • इस चरण की विशेषताएं एक केंद्रीय इकाई का होना तथा बढते हुए नगरीय गुण थे।
    • व्यापार क्षेत्र विकसित हो चुका था और खेती के साक्ष्य भी मिले हैं। उस समय मटर, तिल, खजूर , रुई आदि की खेती होती थी।

    2. परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता (2600ई.पू-1900ई.पू. तक)

    • कोटदीजी नामक स्थान परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के चरण को प्रदर्शित करता है।
    • 2600 ई.पू. तक सिंधु घाटी सभ्यता अपनी परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर चुकी थी।
    • परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता के आने तक प्रारंभिक हड़प्पाई सभ्यता बड़े- बड़े नगरीय केंद्रों में परिवर्तित हो चुकी थी। जैसे- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान में तथा लोथल जो कि वर्तमान में भारत के गुजरात राज्य में स्थित है।
    • सिंधु घाटी सभ्यता के क्रमिक पतन का आरंभ 1800 ई.पू. से माना जाता है,1700 ई.पू. तक आते-आते हड़प्पा सभ्यता के कई शहर समाप्त हो चुके थे। परंतु प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में भी इसके तत्व देखे जा सकते हैं।

    4. उत्तरवर्ती हड़प्पा संस्कृति अथवा परवर्ती हड़प्पा संस्कृति (1900 ई.पू.1300 ई.पू.)

    • कुछ पुरातात्त्विक आँकड़ों के अनुसार उत्तर हड़प्पा काल का अंतिम समय 1000 ई.पू. – 900 ई. पू. तक बताया गया है।

    सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

    1. हड़प्पा

    खोजदयाराम साहनी, 1921 ईं.
    स्थितवर्तमान में रवि नदी के बाएं तट पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में स्थित है।
    साक्ष्य
    • अन्नागार
    • बैलगाड़ी
    • मनुष्य के शरीर की बलुआ पत्थर की बनी मूर्तियाँ
    • इसी स्थल पर स्त्री के गर्भ से निकलते हुए पौधे वाली एक मृण्मूर्ति भी मिली है।

    हड़प्पा से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • स्टुआर्ट पिग्गट ने इसे “अर्द्ध औघोगिकी” नगर कहां है यहां के निवासियों का एक बड़ा भाग व्यापार, तकनीकी, उत्पाद और धर्म के कार्य में संलग्न था उन्होंने हड़प्पा व मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानी कहां है।
    • नगर की रक्षा के लिए पश्चिमी की ओर एक दुर्ग का निर्माण किया गया था। यह दुर्ग उत्तर से दक्षिण की ओर 415 मीटर लंबा तथा पूर्व से पश्चिम की ओर 195 मीटर चौड़ा है जिस टीले पर दुर्ग बना है उसे व्हीलर ने “माउंट ए बी” की संज्ञा दी है।

    2. मोहनजोदड़ो

    खोजराखालदास बनर्जी, 1922 ईं. में।
    स्थितसिंधु नदी के तट पर पाकिस्तान में लरकाना जिले में।
    साक्ष्य
    • विशाल स्नानागर
    • अन्नागार
    • कांस्य की नर्तकी की मूर्ति
    • पशुपति महादेव की मुहर
    • दाड़ी वाले मनुष्य की पत्थर की मूर्ति
    • बुने हुए कपडे

    मोहनजोदड़ो से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • इसका सिंधी भाषा में अर्थ “मृतकों का टीला” होता है।
    • मोहनजोदड़ो की शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक ना होकर जनतंत्रात्मक थी।
    • तांबे तथा टीन को मिलाकर हड़प्पावासी कांसे का निर्माण करते थे मोहनजोदड़ो से कांसे की एक नर्तकी की मूर्ति मिली है। जो द्रवी रवि मोम (lost wax method) विधि से बनाई गई है।

    3. चन्हूदडो़

    खोजसर्वप्रथम N.G मजूमदार ने 1934 ईं. में की। 1935 ईं. में अर्नेट मेकै द्वारा यहां उत्खनन करवाया गया।
    स्थितमोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व सिंध प्रांत पाकिस्तान में।
    साक्ष्यचन्हूदडो़ एकमात्र पुरास्थल है जहां वर्गाकार ईंटो के साक्ष्य मिले हैं।
    बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते के पदचिन्ह
    लिपस्टिक के साक्ष्य मिले हैं।
    मनके बनाने की दुकानें

    चन्हूदडो़ से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • चन्हूदडो़ में किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला। चन्हूदडो़ में पूर्वोत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृति के अवशेष मिलते हैं।
    • यह एक औद्योगिक केंद्र था यहां मणिकारी मोहर बनाने,भार माप के बटखरे बनाने का काम होता था। अर्नेट मेकै ने यहां मनका बनाने का कारखाना वह भट्टी की खोज की है।

    4. धोलावीरा

    खोजखोज पुरातत्वविद जगपति जोशी ने 1969 ईं.  में की और 1989 ईं. से 1991 ईं. तक आर. एस. बिष्ट के द्वारा इसका उत्खनन किया गया।
    स्थितगुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में।
    साक्ष्यधोलावीरा से हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम मिला हैं।
    यहां से सिंधु लिपि के 10 बड़े चिन्हों से निर्मित शिलालेख मिले हैं।
    बाँध अथवा कृत्रिम जलाशय।

    धोलावीरा से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • धोलावीरा के निवासी जल संरक्षण तकनीकी से परिचित थे।
    • नगर तीन भागों में विभाजित था। दुर्ग भाग, मध्य नगर, निचला नगर।

    5. लोथल

    खोजसर्वप्रथम डॉ. S.R राव ने 1955 ईं. में की थी।
    स्थितभोगवा नदी के तट पर गुजरात के अहमदाबाद जिले सरगवाला ग्राम के समीप दक्षिण में।
    साक्ष्यमानव निर्मित बंदरगाह।
    गोदीवाडा।
    चावल की भूसी।
    अग्नि वेदिकाएं।
    शतरंज का खेल।

    लोथल से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • यह स्थल एक प्रमुख बंदरगाह था जो पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था।
    • लोथल नगर को दो भागों में न बांटकर एक ही रक्ष प्राचीर से पूरे नगर को दुर्गीकृत किया गया था।

    6. राखीगढ़ी

    खोजपुरातत्ववेत्ताओं ने हरियाणा स्थित राखीगढ़ी की खोज 1963 ई. में की थी।
    राखीगढ़ी का उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1999 ई. के दौरान अमरेन्द्र नाथ द्वारा किया गया।
    स्थितहरियाणा के हिसार जिले में प्रमुख पुरास्थल है।
    साक्ष्ययहां से अन्नागार व रक्षा प्राचीर के साक्ष्य मिले हैं।
    राखीगढ़ी में एक नर कंकाल भी प्राप्त हुआ है।

    राखीगढ़ी से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • मई 2012 में ग्लोबल हेरीटेज फंड ने एशिया के 10 ऐसे विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया है जिनके नष्ट होने का खतरा है।
    • राखीगढ़ी से प्राक्-हड़प्पा एवं परिपक्व हड़प्पा युग इन दोनों कालों के प्रमाण मिले हैं।

    7. कालीबंगा

    खोजखोज अमलानंद घोष ने 1951 ईं. की। तथा 1961 ईं. में B.B लाल व B.K थापर के निर्देशन में व्यापक खुदाई की गई।
    स्थितघग्घर नदी के बाएं तट पर राजस्थान, गंगानगर जिला में।
    साक्ष्ययहां से जूते हुए खेत के साक्ष्य मिला है।
    अग्नि वेदिकाएँ।
    ऊंट की हड्डियाँ।
    लकड़ी का हल।

    कालीबंगा से संबंधित कुछ अन्य जानकारी

    • कालीबंगा में शवों की अंत्येष्टि संस्कार हेतु तीन विधियों – पूर्ण समाधिकरण, आशिक समाधिकरण एवं दाह संस्कार के प्रमाण मिले हैं।

    8. बनावली

    खोजR.S बिष्ट, 1973 ईं. में की थी।
    स्थितहरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित है।
    साक्ष्य
    • यहां जल निकास प्रणाली का अभाव था।
    • यहां से मिट्टी का बना हल मिला है।
    • बनावली से अधिक मात्रा में जो मिला है

    9. सुत्कान्गेडोर

    खोजस्टीन, 1929 ईं. में।
    स्थितपाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी राज्य बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे पर स्थित है।
    साक्ष्यहड़प्पा और बेबीलोन के बीच व्यापार का केंद्र बिंदु था।

    10. आमरी

    खोजN.G मजूमदार , 1935 ईं.
    स्थितसिंधु नदी के तट पर।
    साक्ष्यहिरन के साक्ष्य

    11. सुरकोतदा

    खोजJ.P जोशी, 1964 ईं.
    स्थितगुजरात।
    साक्ष्य
    • घोड़े की हड्डियाँ
    • मनके

    सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना

    • सिंधु घाटी सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी जिसका ज्ञान इसके पुरातात्विक अवशेषों तथा अनुसंधानों से होता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी पर्यावरण के अनुकूल इनका अद्भुत नगर नियोजन तथा जल निकास प्रणाली।
    • सड़के एक दूसरे को समकोण पर काटती थी लगभग सभी नगर दो भागों में विभाजित थे।
      1. प्रथम भाग (पश्चिमी भाग):-  यह भाग छोटा व ऊंचाई पर स्थित था इसमें दुर्ग निर्मित थे। इसमें शासक वर्ग निवास करता था।
      2. दूसरा भाग (पूर्वी भाग) :- यह भाग बड़ा व निचले इलाके में स्थित था। इस भाग में मजदूर लोग निवास करते थे।
    • सड़कों के किनारे की नालियां ऊपर से ढकी होती थी।
    • हड़प्पा, मोहनजोदड़ो तथा कालीबंगा की नगर योजना लगभग एक समान थी कालीबंगा व रंगपुर को छोड़कर सभी में पक्की हुई ईंटो का उपयोग करते थे।
    • आमतौर पर प्रत्येक घर में एक आंगन एक रसोई तथा एक स्नानागार होता था। अधिकांश घरों में कुओं के अवशेष मिले हैं।
    • हड़प्पा कालीन नगरों के चारों ओर प्राचीर बनाकर किलेबंदी की गई थी जिसका उद्देश्य नगर को चोर, लुटेरे, पशु दस्युओ से बचाना था
    • मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार सिंधु सभ्यता का अद्भुत निर्माण है जबकि अन्नागार सिंधु सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है।
    • घरों के दरवाजे और खिड़कियां मुख्य सड़क पर न खुलकर गलियों में खुलती थी लेकिन लोथल इसका अपवाद है इसके दरवाजे व खिड़कियां मुख्य सड़कों की ओर खुलती थी।

    हड़प्पाई लिपि

    सिंधु घाटी सभ्यता

    लिपि :-

    • हड़प्पा लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न एवं 205 से 400 तक अक्षर है। जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरो व तांबे की गुटीकाओ आदि पर मिलते हैं।
    • इस लिपि का सबसे पुराना नमूना 1853 ईं. में मिला था। और 1923 तक लिपि प्रकाश में आई थी परंतु अभी तक इसको पढ़ा नहीं जा सका है।
    • इसकी लिपि पिक्टेग्राफ अर्थात चित्रात्मक थी। जो दाएं से बाई ओर लिखी जाती थी। इस पद्धति को बूस्र्टोफेडन कहा गया। सबसे ज्यादा चित्र U आकार के तथा मछली के प्राप्त हुए हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता का सामाजिक जीवन

    • समाज की इकाई परंपरागत तौर पर परिवार थी ।
    • मातृ देवी की पूजा तथा मुहारो पर अंकित चित्र से यह पता चलता है कि हड़प्पा समाज संभवतः मातृसत्तात्मक था।
    • समाज में विद्वान पुरोहित, योद्धा ,व्यापारी और श्रमिक वर्ग की मौजूद की थी।
    • हड़प्पावासी साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देते थे। स्त्री एवं पुरुष दोनों आभूषण धारण करते थे यहां से प्रासाधन मंजूषा मिलती है।
    • सिंधु सभ्यता के लोग सूती व ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे।
    • इस सभ्यता के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे।
    • यहां के लोग मनोरंजन के लिए चोपड़ और पासा खेलते थे।
    • अंत्येष्टि मैं पूर्ण समाधिकरण सर्वाधिक प्रचलित था जबकि आशिक समाधिकरण एव दाहसंस्कार का भी चलन था।
    • यहां के लोग गणित, धातु निर्माण, माप तोल प्रणाली, ग्रह नक्षत्र , मौसम विज्ञान इत्यादि की जानकारी रखते थे।

    सिंधु घाटी सभ्यता का राजनीतिक जीवन

    • हड़प्पाइयो के राजनीतिक संगठन का कोई स्पष्ट आभास नहीं है। क्योंकि हड़प्पावासी वाणिज्य, व्यापार की ओर अधिक आकर्षित थे शासन व्यवस्था में भी वणिक अथवा व्यापारी वर्ग की प्रमुख भूमिका महत्वपूर्ण थी।
    • हंटर के अनुसार “मोहनजोदड़ो का शासन राजतत्रात्मक न होकर जनतत्रात्मक” था।
    • व्हिलर के अनुसार “सिंधु सभ्यता के लोगों का शासन मध्यवर्गीय जनतंत्रात्मक शासन था। और उनमें धर्म की महत्ता थी।

    सिंधु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन

    • सिंधु सभ्यता की उन्नति का प्रमुख कारण उन्नत कृषि तथा व्यवसाय था। अतः इस काल की अर्थव्यवस्था ही सिंचित कृषि अधिशेष, पशुपालन विभिन्न दस्तकारीयों में दक्षता और समृद्ध आंतरिक पूर्व विदेश व्यापार पर आधारित थी।
    • सेंधव सभ्यता (सिंधु सभ्यता) का व्यापार केवल सिंध क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था । अपितु मिस्र, मेसोपोटामिया और मध्य एशिया से भी व्यापार होता था।
    • सिंधु सभ्यता के प्रमुख बंदरगाह लोथल, रंगपुर, सुरकोटदा, प्रभासपाटन आदि थे।
    • हड़प्पा सभ्यता में मापन की दशमलव प्रणाली तथा माप तोल की इकाई 16 के गुणांक में होती थी।
    • इस सभ्यता के लोग गेहूं, जो, राई, मटर, तिल, सरसों, कपास आदी की खेती किया करते थे। सबसे पहले कपास पैदा करने का श्रेय सिंधु सभ्यता के लोगों को दिया जाता है।
    • यूनानीयों ने कपास को सिंडन (सिडोन) नाम दिया । यह लोग तरबूज, खरबूज, नारियल, अनार, नींबू, केला जैसे फलों से भी परिचित थे।
    • यहां के प्रमुख खदान गेहूं व जो थे।
    • हड़प्पा सभ्यता एक कांस्य युगीन सभ्यता थी। कृषि कार्य हेतु पत्थर एवं कांस्य के औजारों का प्रयोग किया जाता था। इस सभ्यता में फावड़ा या फाल नहीं मिला है संभवत यह लोग लकड़ी की हेलो का प्रयोग करते थे।
    • सिद्ध नगरों में कृषि पदार्थों की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रों से होती थी इसलिए अन्नागार नदियों के किनारे बनाए गए थे।
    • पशुपालन में बेल, भेड़, बकरी, हाथी, भैंस, गाय, गधे, सूअर, और कुत्ते आदि के होने का अनुमान है। परंतु इस सभ्यता में घोड़े का अभाव मिलता है।
    • गुजरात के निवासी हाथी पालते थे।

    मुहरें

    सिंधु घाटी सभ्यता

    मुहरें :-

    • सिंधु सभ्यता में लगभग 2500 मुहरें प्राप्त हुई है। यह प्रायः आयताकार व वर्गाकार है पशु के चित्र के साथ लिपि वर्गाकार मुहर पर उत्कीर्ण हैं जबकि आयताकार मोहर पर केवल लिपि उत्कीर्ण है।
    • अधिकांश मुहरे सेलखड़ी बनी हुई पाई गई है। हालांकि डॉ मजूमदार का मानना है कि यह मोहरें हाथी दांत की बनी होती थी।
    • इसका प्रयोग दो तरह से होता था। अपनी वस्तुओं की पहचान के लिए व संभवतः उच्च वर्ग के लोग इसे व्यापार करते थे।
    • संभवतः सिक्कों की तरह प्रयोग होता था। इन पर एक त्रंगी पशु, बाघ, बकरी और हाथी की आकृति उकेरी जाती थी।

    मनके

    सिंधु घाटी सभ्यता

    मनके :-

    • हड़प्पा सभ्यता के लोग गोमेद फिरोज लाल पत्थर और सेलखड़ी जैसे बहुमूल्य एवं अर्ध कीमती पत्थरों से बने अति सुंदर मनके का प्रयोग करते थे।
    • मनका बनाने वाली फैक्ट्री का कार्यस्थल चन्हूदडो़ और लोथल से उद्घाटित हुए हैं। सोने और चांदी के मनके भी पाए गए हैं गहनों का ढेर मोहनजोदड़ो में भी पाया गया है।

    सिंधु घाटी सभ्यता की शिल्पकला

    सिंधु घाटी सभ्यता

    शिल्पकला :-

    • हड़प्पाई कांस्य की वस्तुएँ निर्मित करने की विधि व उसके उपयोग से भली भाँति परिचित थे।
    • तांबा राजस्थान की खेतड़ी खान से प्राप्त किया जाता था। और टिन अनुमानतः अफगानिस्तान से लाया जाता था ।
    • बुनाई उद्योग में प्रयोग किये जाने वाले ठप्पे बहुत सी वस्तुओं पर पाए गए हैं।
    • बड़ी -बड़ी ईंट निर्मित संरचनाओं से राजगीरी जैसे महत्त्वपूर्ण शिल्प के साथ साथ राजमिस्त्री वर्ग के अस्तित्व का पता चलता है।
    • हड़प्पाई नाव बनाने की विधि,मनका बनाने की विधि,मुहरें बनाने की विधि से भली- भाँति परिचित थे। टेराकोटा की मूर्तियों का निर्माण हड़प्पा सभ्यता की महत्त्वपूर्ण शिल्प विशेषता थी।
    • जौहरी वर्ग सोने ,चांदी और कीमती पत्थरों से आभूषणों का निर्माण करते थे ।
    • मिट्टी के बर्तन बनाने की विधि पूर्णतः प्रचलन में थी,हड़प्पा वासियों की स्वयं की विशेष बर्तन बनाने की विधियाँ थीं, हड़प्पाई लोग चमकदार बर्तनों का निर्माण करते थे ।

    धर्म

    • टेराकोटा की लघुमूर्तियों पर एक महिला का चित्र पाया गया है, इनमें से एक लघुमूर्ति में महिला के गर्भ से उगते हुए पौधे को दर्शाया गया है।
    • हड़प्पाई पृथ्वी को उर्वरता की देवी मानते थे और पृथ्वी की पूजा उसी तरह करते थे, जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की पूजा देवी के रूप में करते थे ।
    • पुरुष देवता के रूप में मुहरों पर तीन शृंगी चित्र पाए गए हैं जो कि योगी की मुद्रा में बैठे हुए हैं ।
    • देवता के एक तरफ हाथी, एक तरफ बाघ, एक तरफ गैंडा तथा उनके सिंहासन के पीछे भैंसा का चित्र बनाया गया है। उनके पैरों के पास दो हिरनों के चित्र है। चित्रित भगवान की मूर्ति को पशुपतिनाथ महादेव की संज्ञा दी गई है।
    • अनेक पत्थरों पर लिंग तथा स्त्री जनन अंगों के चित्र पाए गए हैं।
    • सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वृक्षों तथा पशुओं की पूजा किया करते थे।
    • सिंधु घाटी सभ्यता में सबसे महत्त्वपूर्ण पशु एक सींग वाला गैंडा था तथा दूसरा महत्त्वपूर्ण पशु कूबड़ वाला सांड था। अत्यधिक मात्रा में ताबीज भी प्राप्त किये गए हैं।

    सिंधु घाटी सभ्यता का पतन

    • सिंधु घाटी सभ्यता का लगभग 1800 ई.पू. में पतन हो गया था, परंतु उसके पतन के कारण अभी भी विवादित हैं। अभी भी यह पता नहीं चल पा रहा है कि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन कैसे हुआ।
    • एक सिद्धांत यह कहता है कि इंडो-यूरोपियन जनजातियों जैसे- आर्यों ने सिंधु घाटी सभ्यता पर आक्रमण कर दिया तथा उसे हरा दिया ।
    • सिंधु घटी सभ्यता के बाद की संस्कृतियों में ऐसे कई तत्त्व पाए गए जिनसे यह सिद्ध होता है कि यह सभ्यता आक्रमण के कारण एकदम विलुप्त नहीं हुई थी ।
    • दूसरी तरफ से बहुत से पुरातत्त्वविद सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण प्रकृति आपदा को मानते हैं।
    • प्राकृतिक कारण भूगर्भीय और जलवायु संबंधी हो सकते हैं।
    • यह भी कहा जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के क्षेत्र में अत्यधिक विवर्तिनिकी विक्षोभों की उत्पत्ति हुई जिसके कारण अत्यधिक मात्रा में भूकंपों की उत्पत्ति हुई।
    • यह भी कारण हो सकता है कि नदियों द्वारा अपना मार्ग बदलने के कारण खाद्य उत्पादन क्षेत्रों में बाढ़आ गई हो ।
    • इन प्राकृतिक आपदाओं को सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण माना गया है , परंतु सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का कारण क्या है? यह अभी भी निश्चित रूप से पता नहीं चला है।

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    FAQ

    Ques 1. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज कब की गई थी?
    Ans. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज :-

    • सर्वप्रथम चार्ल्स मैनस ने 1826 ई. में सिंधु सभ्यता का पता लगाएं जिसका सर्वप्रथम वर्णन उसके द्वारा 1842 में उनकी प्रकाशित पुस्तक मिलता है। 
    • उसके बाद वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर जॉन्स मार्शल के नेतृत्व में पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने उत्खनन कर इसके प्रमुख नगर हड़प्पा का पता लगाया सर्वप्रथम हड़प्पा स्थल की खोज के कारण इसका नाम “हड़प्पा सभ्यता” रखा गया।
    • यह सभ्यता 400 से 500 वर्षों तक विद्यमान रही तथा 2200ईं.पू. से 2000ईं.पू के मध्य तक यह अपनी परिपक्व अवस्था में थी। नवीन शोध के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8000 साल पुरानी।

    Ques 2. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज किसने की थी?
    Ans. सिंधु घाटी सभ्यता की खोज :-

    • सर्वप्रथम चार्ल्स मैनस ने 1826 ई. में सिंधु सभ्यता का पता लगाएं जिसका सर्वप्रथम वर्णन उसके द्वारा 1842 में उनकी प्रकाशित पुस्तक मिलता है। 
    • उसके बाद वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर जॉन्स मार्शल के नेतृत्व में पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने उत्खनन कर इसके प्रमुख नगर हड़प्पा का पता लगाया सर्वप्रथम हड़प्पा स्थल की खोज के कारण इसका नाम “हड़प्पा सभ्यता” रखा गया।
    • यह सभ्यता 400 से 500 वर्षों तक विद्यमान रही तथा 2200ईं.पू. से 2000ईं.पू के मध्य तक यह अपनी परिपक्व अवस्था में थी। नवीन शोध के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8000 साल पुरानी।

    Ques 3. हड़प्पा घाटी सभ्यता की खोज कब की गई थी?
    Ans. हड़प्पा घाटी सभ्यता की खोज दयाराम साहनी ने 1921ई. में और यह वर्तमान में रवि नदी के बाएं तट पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में स्थित है।

    Ques 4. हड़प्पा घाटी सभ्यता की खोज किसने की थी?
    Ans.  हड़प्पा घाटी सभ्यता की खोज दयाराम साहनी ने 1921ई. में और यह वर्तमान में रवि नदी के बाएं तट पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में स्थित है।

    Ques 5. मोहनजोदड़ो की खोज कब की गई थी?
    Ans. मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में की। और यह सिंधु नदी के तट पर पाकिस्तान में लरकाना जिले में स्थित है।

    Ques 6. मोहनजोदड़ो की खोज किसने की थी?
    Ans. मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में की। और यह सिंधु नदी के तट पर पाकिस्तान में लरकाना जिले में स्थित है।

    Ques 7. चन्हूदडो़ की खोज कब की गई थी?
    Ans. चन्हूदडो़ की खोज सर्वप्रथम N.G मजूमदार ने 1934 ई. में की। 1935 ई. में अर्नेट मेकै द्वारा यहां उत्खनन करवाया गया। और यह मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व सिंध प्रांत पाकिस्तान में स्थित है।

    Ques 8. चन्हूदडो़ की खोज किसने की थी?
    Ans. चन्हूदडो़ की खोज सर्वप्रथम N.G मजूमदार ने 1934 ई. में की। 1935 ई. में अर्नेट मेकै द्वारा यहां उत्खनन करवाया गया। और यह मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व सिंध प्रांत पाकिस्तान में स्थित है।

    Ques 9. धोलावीरा की खोज कब की गई थी?
    Ans. धोलावीरा की खोज पुरातत्वविद जगपति जोशी ने 1969 ई. में की और 1989ई. से 1991 ई. तक आर. एस. बिष्ट के द्वारा इसका उत्खनन किया गया। और यह गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में स्थित है।

    Ques 10. धोलावीरा की खोज किसने की थी?
    Ans. धोलावीरा की खोज पुरातत्वविद जगपति जोशी ने 1969 ई. में की और 1989ई. से 1991 ई. तक आर. एस. बिष्ट के द्वारा इसका उत्खनन किया गया। और यह गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में स्थित है।

    Ques 11. लोथल की खोज कब की गई थी?
    Ans. लोथल की खोज सर्वप्रथम डॉ. S.R राव ने 1955 ई. में की थी। और यह भोगवा नदी के तट पर गुजरात के अहमदाबाद जिले सरगवाला ग्राम के समीप दक्षिण में स्थित है।

    Ques 12. लोथल की खोज किसने की थी?
    Ans. लोथल की खोज सर्वप्रथम डॉ. S.R राव ने 1955 ई. में की थी। और यह भोगवा नदी के तट पर गुजरात के अहमदाबाद जिले सरगवाला ग्राम के समीप दक्षिण में स्थित है।

    Ques 13. राखीगढ़ी खोज किसने की थी?
    Ans. पुरातत्ववेत्ताओं ने हरियाणा स्थित राखीगढ़ी की खोज 1963 ई. में की थी। राखीगढ़ी का उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1999 ई. के दौरान अमरेन्द्र नाथ द्वारा किया गया। और यह हरियाणा के हिसार जिले में प्रमुख पुरास्थल है।

    Ques 14. राखीगढ़ी खोज कब की गई थी?
    Ans. पुरातत्ववेत्ताओं ने हरियाणा स्थित राखीगढ़ी की खोज 1963 ई. में की थी। राखीगढ़ी का उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1999 ई. के दौरान अमरेन्द्र नाथ द्वारा किया गया। और यह हरियाणा के हिसार जिले में प्रमुख पुरास्थल है।

    Ques 15. कालीबंगा खोज किसने की थी?
    Ans. कालीबंगा की खोज अमलानंद घोष ने 1951ई. की। 1961ई. में B.B लाल व B.K थापर के निर्देशन में व्यापक खुदाई की गई। और यह घग्घर नदी के बाएं तट पर राजस्थान, गंगानगर जिला में

    Ques 16. कालीबंगा खोज कब की गई थी?
    Ans. कालीबंगा की खोज अमलानंद घोष ने 1951ई. की। 1961ई. में B.B लाल व B.K थापर के निर्देशन में व्यापक खुदाई की गई। और यह घग्घर नदी के बाएं तट पर राजस्थान, गंगानगर जिला में।

    Ques 17. सिंधु घाटी सभ्यता का भौगोलिक विस्तार?
    Ans. सिंधु घाटी सभ्यता का भौगोलिक विस्तार :-

    • सिंधु सभ्यता का भौगोलिक विस्तार पूर्व आलमगीरपुर (मेरठ) से लेकर पश्चिमी में अफगानिस्तान ( सुत्कागेंडोर) तक तथा उत्तर में मांडा (जम्मू ) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक था।
    • वह उत्तर से दक्षिण तक लगभग 1100 किलोमीटर तक तथा पूर्व से पश्चिम 1600 किलोमीटर तक फैली हुई थी अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।
    • सिंधु घाटी सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार है। जिसका क्षेत्रफल लगभग 1300000 वर्ग किलोमीटर।

    Ques 18. सिंधु घाटी सभ्यता का कितना क्षेत्रफल है?
    Ans. सिंधु घाटी सभ्यता का क्षेत्रफल :-

    • सिंधु सभ्यता का भौगोलिक विस्तार पूर्व आलमगीरपुर (मेरठ) से लेकर पश्चिमी में अफगानिस्तान ( सुत्कागेंडोर) तक तथा उत्तर में मांडा (जम्मू ) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक था।
    • वह उत्तर से दक्षिण तक लगभग 1100 किलोमीटर तक तथा पूर्व से पश्चिम 1600 किलोमीटर तक फैली हुई थी अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।
    • सिंधु घाटी सभ्यता का आकार त्रिभुजाकार है। जिसका क्षेत्रफल लगभग 1300000 वर्ग किलोमीटर।

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