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    नाड़ी-शोधन प्राणायाम करने की विधि, फायदे और सावधानियां – Nadi shodhana pranayama in Hindi.1

    नाड़ी-शोधन प्राणायाम

    हेलो दोस्तों INDIA TODAY ONE blog में आपका स्वागत है। इस लेख में हम नाड़ी-शोधन प्राणायाम के विषय पर चर्चा करेंगे।

    यहाँ नाड़ी-शोधन का तात्पर्य नाड़ियों के शुद्धिकरण से है। शरीर की तंत्रिका प्रणाली में किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न होने से अनेक प्रकार की शारीरिक और मानसिक समस्या उत्पन्न होती है। योग से सम्बंधित हमारे कई ग्रंथों में नाड़ियों के शुद्धिकरण हेतु अर्थात् नाड़ी-शोधन प्राणायाम का वर्णन किया गया है। जैसे:- चरक संहिता, घेरण्ड संहिता, शिव संहिता, हठयोग प्रदीपिका आदि।

    पूर्ण एकाग्रता से प्राणायाम का अभ्यास किया जाए तो प्राणायाम का लाभ हमें शुरू से ही मिलने लगता है। परंतु नाड़ी शोधन प्राणायाम का पूर्ण एकाग्रता और सजगता के साथ अभ्यास किया जाए तो बाक़ी के प्राणायामों से बहुत जल्द और अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सकता है। प्राणायाम को करने के लिए एकाग्रता, सजगता और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता होती है। इसकी ऊर्जाओं को अति संवेदनशीलता, एकाग्रता और सूक्ष्मता के साथ श्वास-प्रश्वास को स्थिरता प्रदान करने या अनुशासित करने लिए प्रवाहित करना होता है। ताकि श्वास, प्राण और मस्तिष्क को आध्यात्मिक बनाया जा सके। आत्मा के शुद्धिकरण की यह छोटी परंतु महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। आत्मा से परमात्मा तक पहुँचने का एक रास्ता यहाँ से भी मिलता है।

    सभी प्राणायामों में नाड़ी शोधन प्राणायाम सबसे अधिक संवेदनशील, जटिल और सूक्ष्म है। जब नाड़ी को सूक्ष्मतम स्तर पर प्रासुक किया जाता है तो इससे आत्म-साक्षात्कार होता है। यह आत्मानुभूति की तरफ ले जाती है। नाड़ी-शोधन प्राणायाम के लिए पहले आप अपनी अँगुलियों की प्रवीणता, क्षमता बढ़ाएँ और दूसरा नासिका झिल्लियों में संवेदनशीलता का विकास करें तभी नाड़ी-शोधन प्राणायाम करना सार्थक होगा।

    नाड़ी-शोधन प्राणायाम

    प्रथम अभ्यास।

    नाड़ी-शोधन प्राणायाम

    विधि।

    • सर्वप्रथम सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन किसी भी एक आसन में बैंठ जाएं। 
    • जिस आसन में आप कुछ समय तक आराम से बैठ सकें। 
    • अपने सिर, गर्दन और मेरुदण्ड एक सीध में रखें तथा प्राणायाम करने के लिए तैयार रहें। और ध्यान रखें दोनों कंधे समानांतर होने चाहिए।
    • अब अपना बायाँ हाथ घुटने पर रखिए तथा अपने दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा अँगुलियों को मस्तक के बीचों-बीच (जहां हम तिलक करते हैं। जहां महिलाएं बिंदि लगती है।)रखें।(चित्रानुसार)
    • कुछ योग शिक्षक सिर्फ तर्जनी अँगुली को ही मस्तक के बीच में रखवाते हैं
    • अब नाक के दाएँ तरफ़ अँगूठे को व बाएँ तरफ़ के नासिका द्वार के बाहरी भाग पर अनामिका अँगुली को रखें। 
    • अब दाएँ नासिका द्वार पर अँगूठे से दबाव डालकर बंद कीजिए। तथा बाएँ नासिका द्वार से श्वास लीजिए व श्वास छोड़िए।
    • अभ्यास के दौरान अपना पूरा ध्यान श्वास की तरफ़ रखें। 
    • श्वास लना व श्वास छोडना (पूरक एवं रेचक) मिलाकर एक चक्र हुआ। 
    • इस प्रकार 10 से 15 चक्र करें।
    • अब अपनी अनामिका अँगुली से बायाँ नासिका द्वार को बंद करें और दाएँ नासिका द्वार से उपरोक्त क्रियानुसार 10 से 15 चक्र करें।
    • इस प्राणायाम से अँगुलियो और नासिका नलिका का अभ्यास हो जाता है। ताकि वे अधिक से अधिक लाभ प्राप्ति में सहायक हों।

    समय।

    • इसका अभ्यास 5-10 मिनिट तक करें।

    सावधानियां।

    • अभ्यास के दौरान श्वास कि क्रिया ध्वनि रहित होनी चाहिए। 
    • दोनों नासिका द्वारो से बराबर लय बनाते हुए श्वास लें। 
    • छाती कम-ज़्यादा न फैलाएँ।
    • अभ्यास के दौरान थकान महसूस हो तो शवासन कर लें। और अभ्यास के बाद शवासन कर लें।

    द्वितीय अभ्यास। (अनुलोम-विलोम प्राणायाम)

    नाड़ी-शोधन प्राणायाम

    नाड़ी-शोधन हेतु अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते हैं।

    विधि।

    • सर्वप्रथम सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन किसी भी एक आसन में बैंठ जाएं। 
    • जिस आसन में आप कुछ समय तक आराम से बैठ सकें। 
    • अब अपने दाएँ अँगूठे से दाएँ नासिका द्वार को बंद कीजिए तथा अपने बाएँ नासिका द्वार से श्वास लीजिये (पूरक कीजिए)। 
    • अब अपने बाएँ नासिका द्वार को अनामिका अँगुली से बंद कीजिए और अपने दाएँ नासिका द्वार से श्वास छोड़िए (रेचक कीजिए)। 
    • अब इसी द्वार (दाएँ नासिका द्वार) से श्वास लीजिये। 
    • अब अँगूठे से इसी नासिका द्वार (दाएँ नासिका द्वार) नासिका द्वार बंद कीजिए और अपने बाएँ नासिका द्वार से श्वास छोड़िए। यह पूरी क्रिया एक चक्र है।
    • इस अभ्यास के दौरान साधक को क्रमशः श्वास-प्रश्वास की गति को मंद, मध्यम और फिर तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरक (श्वास लें) करें फिर रेचक (श्वास छोड़े) करें। इस कारण इसमें ध्वनि भी उत्पन्न होती है। 
    • साधक श्वास-प्रश्वास की गति को एक ॐ या दो ॐ या तीन ॐ का मानसिक जप करता हुआ कर सकता है। और इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर सात ॐ तक कर सकता है।
    • इसमें रेचक और पूरक के समय में समानता रहनी चाहिए।
    • इसके अभ्यास से मूलाधार की शक्ति ऊर्ध्वमुखी होती है।

    समय।

    • इसका अभ्यास 3-10 मिनिट तक करें।

    सावधानियां।

    • अभ्यास के दौरान थकान और तनाव महसूस हो तो शवासन कर लें। कुछ क्षण रुकें। विश्राम करें एवं थकान दूर होने पर पुनः प्राणायाम करें और अभ्यास के बाद शवासन कर लें।

    तृतीय अभ्यास।

    विधि।

    • सर्वप्रथम सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन किसी भी एक आसन में बैंठ जाएं। 
    • जिस आसन में आप कुछ समय तक आराम से बैठ सकें। 
    • अब अपने दाएँ अँगूठे से दाएँ नासिका द्वार को बंद कीजिए तथा अपने बाएँ नासिका द्वार से श्वास लीजिये (पूरक कीजिए)। 
    • अब अपनी दोनों नासिका द्वारों को बंद कर अंत:कुंभक (श्वास अन्दर रोकें) करें।
    • अब दाएँ नासिका द्वार से श्वास छोड़िए (रेचक करे)। 
    • अब इसी नासिका द्वार (दाएँ नासिका द्वार) से श्वास लीजिये, अंत:कुंभक (श्वास अन्दर रोकें) करें और बाएँ नासिका द्वार से श्वास छोड़िए (रेचक करें)। – यह एक चक्र हुआ। 
    • अंत:कुंभक (श्वास अन्दर रोकें) करते समय आप अपने मन ही मन में ॐ का उच्चारण करें या 5 तक गिने। इस प्रकार लगभग 25 चक्र पूरे करें। 
    • बाद में अभ्यास के दौरान पूरक, अंत: कुंभक और रेचक का अनुपात 5:10:10 कर लें। अर्थात् 5 गिनने तक पूरक करें, 10 गिनने तक अंत: कुंभक करें और 10 गिनने तक ही रेचक करें। 
    • पुर्णत: अभ्यास हो जाने के बाद गिनती में वृद्धि कर लें। 
    • तनाव रहित व प्रसन्नचित होकर के श्वास-प्रश्वास एवं अतः कुंभक करें।
    •  इसके पश्चात किसी योग्य योग गुरु से पूछकर या इन आंकड़ों के अनुसार अनुपात में वृद्धि करें जैसे 1:6:2, आगे 1:6:4, अभ्यास हो जाने के बाद 1:8:6 के अनुपात में अभ्यास का क्रम बनाए रखें।
    •  यहाँ 1:8:6 का मतलब 5×1=5 गिनने में पूरक करें 5×8=40 गिनने तक अंत: कुंभक करें और 5×6=30 गिनने तक रेचक करें। 

    समय।

    • इसका अभ्यास लगभग 10 से 15 मिनिट या लगभग 20 से 25 चक्र करें।

    चतुर्थ अभ्यास।

    चतुर्थ अभ्यास की विशेषता।

    • इस अभ्यास के दौरान अंतःकुंभक के साथ बहिकुंभक भी करना होता है अतः पूर्ण सावधानी रखें। 
    • अभ्यास का स्थान शांतिमय हो (हवादार कमरा, बाग-बगीचे) तथा तनाव रहित व प्रसन्नचित होकर के अभ्यास करें।
    • अभ्यास के दौरान अनुपात का क्रम इस प्रकार रहेगा 1:4:2:2 अर्थात् 5×1=5 गिनने तक पूरक करें, 5×4=20 गिनने तक अंत:कुंभक 5×2=10 गिनने तक रेचक और 5×2=10 गिनने तक ही बाहृय कुंभक (श्वास बाहर रोकना) करें। 
    • पुर्ण अभ्यास हो जाने के बाद यदि पूरक का समय बढ़ाते हो तो बाक़ी का समय भी उसी अनुपात में बढ़ा लें। 
    • योग्य योग गुरु से पूछकर या अभ्यास में पुर्णत् दृढ़ता आने पर कुंभक के समय मूल बंध या जालधर बंध लगाने का अभ्यास कर सकते हैं। 
    • अभ्यास के बाद शवासन ज़रूर करें।

    विधि।

    • सर्वप्रथम सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन किसी भी एक आसन में बैंठ जाएं। 
    • जिस आसन में आप कुछ समय तक आराम से बैठ सकें। 
    • अब बाएँ नासिका द्वार से पूरक करें। अंतकुंभक करें।
    • अब दाएँ नासिका द्वार से रेचक करें। बहिकुंभक करें। 
    • अब फिर उल्टे क्रम से दाएँ नासिका द्वार से पूरक करें। अंतकुंभक करें। और बाएँ नासिका द्वार से रेचक करें। बहिकुंभक करें। यह 1 चक्र हुआ। 
    • इस प्रकार यथासंभव 15 चक्र करें।

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    नाड़ी-शोधन प्राणायाम लाभ।

    • नाड़ी शोधन को प्राणायाम का राजा भी कहा जाता है यह अन्य प्राणायामों के आधार स्थल हैं। अतः हम जितना अच्छा नाड़ी-शोधन प्राणायाम का अभ्यास करेगा, तो बाक़ी के प्राणायामों से उतने ही अच्छे एवं अधिक ही लाभ प्राप्त होंगे।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास होता है।
    • नाड़ी शोधन प्राणायाम शरीर में स्थित 72 हजार नाड़ियाँ है इनमें से तीन मुख्य नाड़ियाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना है। जो शरीर में प्राण उर्जा का संचार करती है, उन्हें स्वच्छ करने में मदद करता है। इससे रक्त वाहिनियाँ साफ़ होती हैं व शरीर में रक्त का संचार सामान्य होता है।
    • इसके अभ्यास से शारीरिक एवं मानसिक संतुलन स्थापित होता है, जिस कारण शारीरिक एवं मानसिक रोग नहीं होते।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से मस्तिष्क में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है। जिससे मस्तिष्क चुस्त, क्रियात्मक और संवेदनशील बनाता है। मानसिक विकार में लाभ होता है। इसके अभ्यास से धैर्य, मानसिक शांति, निर्णय लेने की क्षमता, एकाग्रता का विकास होता है।
    • इसके प्रतिदिन अभ्यास से धारणा, ध्यान और समाधि का स्तर बढ़ता है और मन शांत, प्रसन्नचित्त रहता है।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होता हैं। यह रक्त में मौजूद विषाणुओं को खत्म करता है और फेफड़े (Lungs), स्नायु तंत्र (Nervous System) और श्वसन प्रणाली (Respiratory System) को शक्तिशाली बनाता है। 
    • इसके नियमित अभ्यास से  रक्तचाप (blood pressure), नींद न आना, तनाव, क्रोध, मानसिक विकार में लाभ होता है। 
    • कई गुण स्वतः बढ़ते हैं और मिथ्यात्व (असत्यता) का धीरे-धीरे नाश होता है।
    • दमा (Asthma), टॉन्सिल, कफ़ सम्बंधी रोग, हड्डी, चर्म, नींद न आना, तनाव, क्रोध, मानसिक विकार में एवं रक्तचाप (blood pressure) के नियंत्रण में अति लाभदायक, माईग्रेन एवं साइनस में विशेष लाभप्रद

     

    FAQs

     

    Ques 1. नाड़ी-शोधन प्राणायाम करने के क्या फायदे है?

    Ans. नाड़ी-शोधन प्राणायाम लाभ।

    • नाड़ी शोधन को प्राणायाम का राजा भी कहा जाता है यह अन्य प्राणायामों के आधार स्थल हैं। अतः हम जितना अच्छा नाड़ी-शोधन प्राणायाम का अभ्यास करेगा, तो बाक़ी के प्राणायामों से उतने ही अच्छे एवं अधिक ही लाभ प्राप्त होंगे।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से रोग प्रतिरोधक शक्ति का विकास होता है।
    • नाड़ी शोधन प्राणायाम शरीर में स्थित 72 हजार नाड़ियाँ है इनमें से तीन मुख्य नाड़ियाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना है। जो शरीर में प्राण उर्जा का संचार करती है, उन्हें स्वच्छ करने में मदद करता है। इससे रक्त वाहिनियाँ साफ़ होती हैं व शरीर में रक्त का संचार सामान्य होता है।
    • इसके अभ्यास से शारीरिक एवं मानसिक संतुलन स्थापित होता है, जिस कारण शारीरिक एवं मानसिक रोग नहीं होते।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से मस्तिष्क में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है। जिससे मस्तिष्क चुस्त, क्रियात्मक और संवेदनशील बनाता है। मानसिक विकार में लाभ होता है। इसके अभ्यास से धैर्य, मानसिक शांति, निर्णय लेने की क्षमता, एकाग्रता का विकास होता है।
    • इसके प्रतिदिन अभ्यास से धारणा, ध्यान और समाधि का स्तर बढ़ता है और मन शांत, प्रसन्नचित्त रहता है।
    • नाड़ी-शोधन प्राणायाम के अभ्यास से समस्त नाड़ियों का शुद्धिकरण होता हैं। यह रक्त में मौजूद विषाणुओं को खत्म करता है और फेफड़े (Lungs), स्नायु तंत्र (Nervous System) और श्वसन प्रणाली (Respiratory System) को शक्तिशाली बनाता है। 
    • इसके नियमित अभ्यास से  रक्तचाप (blood pressure), नींद न आना, तनाव, क्रोध, मानसिक विकार में लाभ होता है। 
    • कई गुण स्वतः बढ़ते हैं और मिथ्यात्व (असत्यता) का धीरे-धीरे नाश होता है।
    • दमा (Asthma), टॉन्सिल, कफ़ सम्बंधी रोग, हड्डी, चर्म, नींद न आना, तनाव, क्रोध, मानसिक विकार में एवं रक्तचाप (blood pressure) के नियंत्रण में अति लाभदायक, माईग्रेन एवं साइनस में विशेष लाभप्रद
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