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    योग क्या हैं – परिभाषा, अर्थ, प्रकार, महत्व, उद्देश्य और इतिहास | 1

    योग

    हेलो दोस्तों आपका INDIA TODAY ONE blog में स्वागत है। इस लेख में हम योग के बारे में जानेंगे।

    योग का इतिहास

    • YOGA की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। और इसकी उत्‍पत्ति हजारों वर्ष पहले हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्‍यता आरम्भ हुई है तभी से YOGA किया जा रहा है। अर्थात प्राचीनतम धर्मों या आस्‍थाओं के जन्‍म लेने से पहले ही YOGA का जन्म हो चुका था। YOGA विद्या में शिव को “आदि योगी” तथा “आदि गुरू” माना जाता है।
    • भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही YOGA का प्रारम्भ माना जाता है। बाद में कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से विस्तारित किया। इसके पश्चात पतञ्जलि ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया। इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ, वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तारित किया।
    • YOGA से सम्बन्धित सबसे प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्य सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त वस्तुएँ से हुए हैं जिनकी शारीरिक मुद्राएँ और आसन उस काल में YOGA के अस्तित्व के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। YOGA के इतिहास पर यदि हम दृष्टि डालें तो इसके प्रारम्भ या अन्त का कोई प्रमाण नही मिलता, लेकिन YOGA का वर्णन सर्वप्रथम वेदों में मिलता है और वेद ग्रंथ सबसे प्राचीन साहित्य माने जाते है। YOGA की शुरुआत भारत में हुई थी।

    योग क्या है

    • योग शब्द “युज” से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है- एकजुट करना या एकीकृत करना
    • योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है। ‘योग’ शब्द तथा इसकी प्रक्रिया और धारणा हिन्दू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बन्धित है।

    योग की परिभाषा

    • हमारे सनातन धर्म, बौद्ध धर्म और महर्षियों के अनुसार YOGA की परिभाषा कुछ इस प्रकार है।

    1. महर्षि पतंजलि के अनुसार :-

    • “योगश्चित: वृत्ति निरोध:” :- अर्थात अभ्यास व वैराग्य द्वारा चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है
    • यहां चित्त की वृत्तियों से तात्पर्य है। हमारी कामना, लोभ, वासन आदि।

    योग

     

    2. महर्षि वेदव्यास के अनुसार :-

    • महर्षि वेदव्यास के अनुसार “योग का अर्थ समाधि” है।

    योग

     

    3. भागवत गीता के अनुसार :-

    • “तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्”
    • योगः कर्मसु कौशलम्”÷ अर्थात् योग से ही कर्मों में कुशलता है अर्थात् कर्म बंधनों से छूटने का उपाय है।

    योग

     

    4. बौद्ध धर्म के अनुसार :-

    • “कुशल चितैकाग्गता योगः”÷ अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।

    योग

     

    YOGA का अर्थ

    • YOGA का अर्थ व्यायाम व आसन मात्र नहीं है आसन व व्यायाम तो YOGA का एक भाग है YOGA का रूप तो बहुत विस्तृत है किंतु वर्तमान में लोगों ने YOGA को केवल आसन व प्राणायाम से जोड़ दिया है वास्तव में जो योगी है वह केवल शरीर पर ध्यान नहीं देते अपितु अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके ईश्वर के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं और ईश्वर में ध्यान लगाते हैं
    • YOGA का प्रथम अनुभव शरीर से ही संबंधित है इसका प्रथम कार्य शरीर को स्वस्थ बनाना है YOGA आरंभ करने के कुछ दिन पश्चात व्यक्ति अपने आप को रोगमुक्त और ऊर्जावान अनुभव करने लगता है।
    • इसके पश्चात YOGA के माध्यम से मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है अर्थात व्यक्ति की भावनाओं और विचारों की शुद्धि होना आरंभ होती है YOGA के इस अनुभव से मस्तिक से अवसाद, चिंता, नकारात्मक विचार आदि पर नियंत्रण करना संभव हो जाता है।

    1. YOGA का शाब्दिक अर्थ÷

    • YOGA का शाब्दिक अर्थ है÷ जोड़ना, एक होना या बांधना योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृति भाषा के “यूज” शब्द से हुई है जिसका अर्थ है जोड़ना,एक होना या बांधना।
    • अर्थात् एक होने का अर्थ आत्मा और परमात्मा के एकीकरण से है। मनुष्य भ्रमवश, अज्ञानतावस, द्वैतभाव चित की वृत्तियो के कारण अपने आप को अर्थात् आत्मा को परमात्मा से अलग समझता है लेकिन आत्मा का परमात्मा से जुड़ना, एक होना ही YOGA है।

    2. YOGA का वास्तविक अर्थ÷

    • YOGA के अर्थ व इन परिभाषा के माध्यम से कह सकते हैं जो YOGA है वह एक दर्शन है जो व्यक्ति को जीवन के लक्ष्य प्राप्त करने का रास्ता दिखाता है अर्थात् जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता करता है YOGA के आठ अंग व क्रियाएं हैं। जो इस प्रकार है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान व समाधि। YOGA के आठ अंग व क्रियाओं को अपनाकर व्यक्ति लोभ, मोह, कामना, वासना आदि से मुक्त हो जाता है। और व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण हो जाता है। जब मन व ध्यान एक जगह केंद्रित हो जाता है। तो वह स्थिर हो जाता है और स्थिर की अवस्था को ही समाधि कहते हैं। व्यक्ति जब समाधि की अवस्था में पहुंच जाता है तो उसकी आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है और मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है इसी का नाम YOGA है।

    3. YOGA का व्यावहारिक अर्थ÷

    • YOGA ही एक ऐसा साधन या माध्यम है। जिसके द्वारा व्यक्ति अपने मन, शरीर और भावनाओं पर नियंत्रण कर सकता है। और YOGA से शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक शक्ति का विकास होता है।

    YOGA के प्रकार

    YOGA 6 प्रकार के हैं :-

    1. कर्मयोग
    2. ज्ञानयोग
    3. भक्तियोग
    4. राजयोग
    5. हठयोग
    6. कुंडलिनी/लययोग

    इसके अतिरिक्त बहिरंगयोग, मंत्रयोग व स्वरयोग आदि योगो के अनेक आयामों की भी चर्चा की जाती है, लेकिन मुख्यत: 6 प्रकार के ही YOGA माने गए हैं।

    1. कर्मयोग

    • वास्तव में कर्म YOGA ही वह योग है जिसके माध्यम से हम अपनी जीवात्मा से जुड़ पाते हैं। कर्मयोग हमारे आत्मज्ञान को जागृत करता है।
    • इस YOGA में कर्म के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति की जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कर्मयोग का सीधा संबंध व्यक्ति के कर्मों से है।
    • हमारे शास्त्र कहते हैं। कि हम इस संसार में जिस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करते हैं। जो भी सुख या दुख हो रहे हैं। जैसा भी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जो हमें प्राप्त हुआ है। जो हमें प्राप्त नहीं हुआ यह सभी हमारे किए गए कर्मों पर आधारित है। इसीलिए भविष्य को अच्छा बनाने के लिए हमें वर्तमान में अच्छे कर्म करने चाहिए।

    2. भक्तियोग

    • भक्ति का अर्थ दिव्य प्रेम और योग का अर्थ जुड़ना है। ईश्वर, सृष्टि, प्राणियों, पशु-पक्षियों आदि के प्रति प्रेम, समर्पण भाव और निष्ठा को ही भक्ति YOGA माना गया है।
    • हर कोई किसी न किसी को अपना ईश्वर मानकर उसकी पूजा करता है, बस उसी पूजा को भक्तियोग कहा गया है। यह भक्ति निस्वार्थ भाव से की जाती है। ताकि हम अपने उद्देश्य को सुरक्षित हासिल कर सकें भक्ति YOGA में अपनी समस्त ऊर्जा व विचारों और मन व ध्यान को भक्ति में केंद्रित करना होता है।

    3. ज्ञानयोग

    • YOGA की सबसे कठिन व प्रत्येक शाखा ज्ञानयोग है। इस YOGA में बुद्धि पर कार्य कर बुद्धि को विकसित किया जाता है वास्तव में जितने ज्ञानी व्यक्ति हुई है। जो स्वयं का उद्देश्य समझता है। तथा ब्रह्मचर्य का सही अर्थ जानता है वह उस परमात्मा में ध्यान केंद्रित करके ही जीवन व्यतीत करता है।

    4. हठयोग

    • हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक किसी कार्य को करने से लिया जाता है।
    • हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठ का अर्थ इस प्रकार दिया है। “ह” का अर्थ सूर्य तथा “ठ” का अर्थ चन्द्र बताया गया है। सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है।
    • हठ प्रदीपिका पुस्तक में हठयोग के चार अंगों का वर्णन है- आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बन्ध तथा नादानुसधान।

    5. कुंडलिनी/लययोग

    • YOGA के आचार्यों ने लय को भी ईश्वर प्राप्ति का एक साधन माना है इसका अर्थ है- ‘‘मन को परमात्मा में लय कर देना, अर्थात् परमात्मा में लीन हो जाना’’
    • YOGA के अनुसार मानव शरीर में सात चक्र होते हैं। जब ध्यान के माध्यम से कुंडलिनी को जागृत किया जाता है, तो शक्ति जागृत होकर मस्तिष्क की ओर जाती है। इस दौरान वह सभी सातों चक्रों को क्रियाशील करती है। इस प्रक्रिया को ही कुंडलिनी/लय YOGA कहा जाता है। इसमें मनुष्य बाहर के बंधनों से मुक्त होकर भीतर पैदा होने वाले शब्दों को सुनने का प्रयास करता है, जिसे नाद कहा जाता है। इस प्रकार के अभ्यास से मन की चंचलता खत्म होती है और एकाग्रता बढ़ती है

    6. राजयोग

    • राज का अर्थ है सम्राट इसमें व्यक्ति एक सम्राट के समान स्वाधीन होकर आत्मविश्वास के साथ कार्य करता है राजयोग आत्म अनुशासन और अभ्यास का मार्ग है। राजयोग सभी योगों का राजा कहलाया जाता है। इन्हें अष्टांग YOGA भी कहा जाता है। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है। इसे योग सूत्र में महर्षि पतंजलि ने उल्लिखित किया है।

    महर्षि पतंजलि ने YOGA के आठ प्रमुख अंग बताए हैं

    महर्षि पतंजलि कहते हैं कि ईश्वर और अपने इस जन्म के सत्य को जानने के लिए आरंभ शरीर से ही करना होगा शरीर बदलेगा तो चित बदलेगा चित बदलेगा तो बुद्धि बदलेगी और चित पूर्ण रूप से सशक्त होता है तभी व्यक्ति की आत्मा परमात्मा के साथ YOGA करने में सक्षम होती है वर्तमान में साधारण व्यक्ति केवल तीन ही अंगों का पालन करते हैं आसन प्राणायाम ध्यान इनमें से ध्यान करने वाले व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है सामान्य लोग YOGA के आठों अंगो को YOGA प्रक्रिया में शामिल नहीं करते हैं जिस कारण YOGA का संपूर्ण लाभ नहीं मिलता वास्तव में जो योगी है वह YOGA के आठों अंगो का पालन करके स्वयं को ईश्वर से जोड़ते हैं।

    1. यम
    2. नियम
    3. आसन
    4. प्राणायाम
    5. प्रत्याहार
    6. धारणा
    7. ध्यान
    8. समाधि

    1. यम

    • सामाजिक व्यवहार का पालन करने को यम कहते हैं जैसे लोभ ना करना, किसी को प्रताड़ित ना करना, चोरी-डकैती व नशा ना करना, बिना कुछ गलत किया सत्य के आधार पर जीवन का निर्वाह करना इस प्रकार के जीवन की शपथ लेना अर्थात आत्म नियंत्रण यम का भाग है।

    इसके पांच सिद्धान्त है।

    1. अहिंसा- हिंसा नहीं

    • अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीवित प्राणी को विचार, शब्द या व्यवहार से तकलीफ या हानि नहीं पहुंचाना।

    2. सत्य :- सदैव सत्य बोलना

    3. अस्तेय-चोरी न करना

    • अस्तेय का अर्थ है कि आप कभी ऐसी वस्तु न लें जो किसी अन्य से संबंधित है। इसका अर्थ है न केवल भौतिक वस्तुएं ही नहीं मानसिक संपति का चुराना उसकी आशा या प्रसन्नता का अपहरण भी है। प्रकृति का शोषण और पर्यावरण को हानि पहुंचाना भी इस श्रेणी में आते हैं।

    4. ब्रह्मचर्य

    • ब्रह्मचर्य का अनुवाद प्राय: यौन क्रियाओं के रूप में किया जाता है। किन्तु ब्रह्मचर्य का अर्थ है कि हमारे विचार सदैव ईश्वर की ओर ही प्रेरित रहें। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम इस विश्व में अपने कर्तव्यों से पीछे हटे। इसके विपरीत हम इन उत्तरदायित्वों को अत्यधिक सावधानी के साथ निभाते हुए, किन्तु सदैव इस बात का ध्यान रखते हुए कि “मैं कर्ता नहीं हूँ, ईश्वर ही कर्ता है।”

    5. अपरिग्रह-वस्तुओं का संग्रह नहीं करना

    2. नियम :- अनुशासन

    नियम का संबंध व्यक्ति के अनुशासन (आचरण) से है। चरित्र, आत्म, अनुशासन आदि। आदर्श व्यक्ति के अभिन्न अंग है

    इसके पांच सिद्धान्त है :-

    1. शौच

    • सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है आन्तरिक शुद्धता। हमारी वेषभूषा, हमारा शरीर उन्हीं के समान हमारे विचार और भावनाएं भी शुद्ध होने चाहिये।

    2. सन्तोष (संतुष्टी)

    • सबसे महानतम धन है तो वह धन मन का संतोष है भारतीय कवि तुलसीदास ने कहा है: “आप स्वर्ण और अन्य मूल्यवान नगों की खानें अपने स्वामित्व में रख सकते हैं, किन्तु आन्तरिक असंतोष सारे धन का विनाश कर देता है।”

    3. तप

    • जीवन में जब हम प्रतिकूलता और बाधाओं से घिरे होते हैं, तब हमें हताश कभी भी नहीं होना चाहिये। इसके स्थान पर हमें अपने चुने हुए मार्ग पर दृढ़ निश्चय के साथ बढ़ते रहना चाहिये। आत्म-अनुशासन, धैर्य और दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ अभ्यास निरंतर जारी रखना यही सफलता की कुंजी है।

    4. स्वाध्याय :- पवित्र ग्रन्थों का अध्ययन करना

    • YOGA की अपेक्षा रखने वालो के रूप में हमें अपने परम्परागत योग दर्शन के पवित्र ग्रन्थों अर्थात् भगवद् गीता, उपनिषद्, पातंजलि के योग सूत्रों आदि से भी परिचित हो जाना चाहिये। ये महाग्रन्थ हमें योग मार्ग पर जाने के लिए अति मूल्यवान ज्ञान और सहायता प्रदान करते हैं।

    5. ईश्वर प्रणिधान- ईश्वर की शरण में

    • आप जो भी कुछ करते हैं वह सब दिव्य आत्मा ईश्वर को पूर्ण निष्ठा के साथ समर्पित कर दें। ईश्वर उन सब की रक्षा करता है जो विश्वास और भक्ति के साथ अपना सर्वस्व समर्पण कर देते हैं।

    (3) आसन (शारीरिक व्यायाम)

    • शरीर के अंगों को उचित रूप से संचालित रखने के लिए जो योगिक क्रियाएं की जाती है वह आसन का भाग है।
    • योगासनों की सूची :-यहाँ आपको सबसे ज्यादा किए जाने वाले योगासनों की सूची मिलेगी।
    1. अधोमुख श्वानासन31. कर्नापीड़ासन61. सेतुबंधासनसेतुबंधासन
    2. अधोमुखवृक्षासन32. कौण्डिन्यसन62. सिद्धासन
    3. आकर्ण धनुरासन33. क्रौञ्चासन63. सिंहासन
    4. अनन्तासन34. कुक्कुटासन64. शीर्षासन
    5. अज्जनेयासन35. कूर्मासन65. सुखासन
    6. अर्धचन्द्रासन36. लोलासन66. सुप्त पादांगुष्ठासन
    7. अष्टांग नमस्कार37. मकरासन67. सूर्य नमस्कार
    8. अष्टावक्रासन38. मालासन68. स्वस्तिकसन
    9. बद्धकोणासन39. मंडूकासन69. ताड़ासन
    10. बकासन या ककासन40. मरीच्यासन70. टिट्टिभासन
    11. बालासन41. मत्स्यासन71. त्रिकोणासन या उत्थित त्रिकोणासन
    12. भैरवासन42. मत्स्येन्द्रासन72. त्रिविक्रमासन
    13. अण्कुशासन43. मयूरासन73. तुलासन
    14. भरद्वाजासन44. मुक्तासन74. उपविष्टकोणासन
    15. भेकासन45. नटराजासन75. ऊर्ध्व धनुरासन या चक्रासन ऊर्ध्व मुख श्वानासन
    16. भुजंगासन46. नावासन या परिपूर्णनावासन या नौकासन76. उष्ट्रासन
    17. बिडालासन या मार्जरी आसन47. पद्मासन77. उत्कटासन
    18. दण्डासन48. परिघासन78. उत्तानासन
    19. दंडासन49. पार्श्वकोणासन79. उत्थित हस्त पादांगुष्ठासन
    20. धनुरासन50. पार्श्वोत्तनासन80. वज्रासन
    21. दुर्वासासन51. पाशासन81. वसिष्ठासन
    22. गर्भासन52. पश्चिमोत्तानासन82. विपरीत दण्डासन
    23. गरुडासन53. पिन्च मयूरासन83. विपरीतकरणि
    24. गोमुखासन54. प्रसारित पादोत्तानासन84. विपरीत वीरभद्रासन
    25. गोरक्षासन55. राजकपोतासन85. वीरभद्रासन 1
    26. हलासन56. शलभासन86. वीरभद्रासन 2
    27. हनुमानासन57. सालम्बसर्वाङ्गासन87. वीरभद्रासन 3
    28. जानुशीर्षासन58. समकोणासन88. वीरासन
    29. ञटर परिवर्तनासन59. शवासन89. वृक्षासन
    30. कपोतासन60. सर्वांगासन90. वृश्चिकासन
    91. योगनिद्रासन

    4. प्राणायाम (श्वास व्यायाम)

    • प्राणवायु को संतुलित रूप से ग्रहण करना नियमित रूप से लंबी व गहरी श्वास लेना आदि इसके भाग है। शरीर और श्वास पर नियन्त्रण करने की प्रक्रिया में योगी मन पर नियन्त्रण भी कर लेते हैं। इससे वे आन्तरिक शक्तियां जागृत हो जाती हैं जो आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन करना जारी रखती हैं।

    5. प्रत्याहार (अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेना)

    • प्रत्याहार का अर्थ है संसार में किसी भी वस्तु या मनुष्य से मोह या आसक्ति ना होना अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अपने मन और इन्द्रियों को अपनी इच्छानुसार संचालित करना ।

    6. धारणा :- (अर्थात् एकाग्रता)

    • मन की एकाग्रता को ही धारणा कहते हैं। एकाग्रता मनुष्य को सफलता/लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है। YOGA में ऐसी कई क्रियाएं व आसन है। जिससे हम अपनी एकाग्रता में वृद्धि कर सकते हैं।

    7.  ध्यान

    • इस अवस्था में निर्विचार होकर श्वसो पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। संपूर्ण ध्यान श्वास लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पर ही केंद्रित होता है। इस प्रकार समय के साथ व्यक्ति ध्यान की प्रक्रिया में सफल होता है। जिससे मन को शान्ति प्राप्त होती है।

    8. समाधि

    • जब ध्यान पर नियंत्रण हो जाता है तब व्यक्ति समाधि की अवस्था में पहुंचता है अर्थात परम ब्रह्म में लीन हो जाता है समाधि की अवस्था में व्यक्ति परम आनंद को प्राप्त करता है। समाधि वह अवस्था है जहां ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय एक हो जाते हैं। ज्ञाता (अभ्यास करने वाला व्यक्ति), ज्ञान (ईश्वर क्या है) और ज्ञेय (अर्थात् ईश्वर) एक हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति दिव्य चेतना के साथ समाहित (जुड़) हो जाता है। जो समाधि प्राप्त कर लेते हैं वे एक स्वर्गिक, उज्ज्वल प्रकाश देखते हैं, स्वर्गिक ध्वनि सुनते हैं और अपने ही में एक अनन्त विस्तार देखते हैं।

    YOGA के नियम

    अगर आप इन कुछ सरल नियमों का पालन करेंगे, तो अवश्य ही आपको YOGA अभ्यास का पूरा लाभ मिलेगा।

    • किसी गुरु के निर्देशन में YOGA अभ्यास आरम्भ करें।
    • सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त YOGA का सही समय है।
    • YOGA करने से पहले स्नान ज़रूर करें।
    • YOGA खाली पेट करें और योग करने के 2 घंटे पहले कुछ ना खायें।
    • YOGA आरामदायक सूती कपड़े पहन के करे
    • तन की तरह मन भी स्वच्छ होना चाहिए YOGA करने से पहले सब बुरे ख़याल दिमाग़ से निकाल दें।
    • किसी शांत वातावरण और साफ जगह में YOGA अभ्यास करें।
    • अपना पूरा ध्यान अपने YOGA अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।
    • YOGA अभ्यास धैर्य और दृढ़ता से करें।
    • अपने शरीर के साथ जबरदस्ती बिल्कुल ना करें।
    • धीरज रखें। YOGA के लाभ महसूस होने मे वक़्त लगता है।
    • निरंतर YOGA अभ्यास जारी रखें।
    • YOGA करने के 30 मिनिट बाद तक कुछ ना खायें। 1 घंटे तक न नहायें।
    • प्राणायाम हमेशा आसन अभ्यास करने के बाद करें।
    • अगर कोई मेडिकल तकलीफ़ हो तो पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह करें।
    • अगर तकलीफ़ बढ़ने लगे या कोई नई तकलीफ़ हो जाए तो तुरंत YOGA अभ्यास रोक दें।
    • योगाभ्यास के अंत में हमेशा शवासन करें।

    YOGA के प्रमुख उद्देश्य 

    YOGA के उद्देश्य :-

    • तनाव से मुक्त जीवन
    • मानसिक शक्ति का विकास करना
    • प्रकृति के विपरीत जीवन शैली में सुधार करना
    • निरोगी काया
    • रचनात्मकता का विकास करना
    • मानसिक शांति प्राप्त करना
    • सहनशीलता में वृद्धि करना
    • नशा मुक्त जीवन
    • वृहद सोच
    • उत्तम शारीरिक क्षमता का विकास करना

    YOGA के लाभ/महत्व

    • रोज सुबह उठकर YOGA का अभ्यास करने से अनेक फायदे हैं YOGA मन, मस्तिष्क, ध्यान और शरीर के सभी अंगो का एक संतुलित वर्कआउट है जो आपके सोच-विचार करने की शक्ति व मस्तिष्क के कार्यों को बढ़ाता है तनाव को कम करता है।
    • YOGA मन को अनुशासित करता है।
    • जहां जीम व एक्सरसाइज आदि से शरीर के किसी विशेष अंग का विकास या व्यायाम हो पाता है वही YOGA करने से शरीर के समस्त अंगों का, ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों, ग्रंथियों का विकास और व्यायाम होता है जिससे शरीर के समस्त अंग सुचारू रूप से कार्य करते हैं।
    • प्रतिदिन YOGA करने से शरीर निरोगी बनता है।
    • YOGA का प्रयोग शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए हमेशा से होता आ रहा है आज की चिकित्सा शोधों व डॉक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि YOGA शारीरिक और मानसिक रूप से मानव जाति के लिए वरदान है।
    • YOGA एकाग्रता को बढ़ाता है। प्रतिदिन योग करने से हमारी अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता बढ़ती है।
    • प्रतिदिन योगासन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है शरीर स्वस्थ, निरोगी और बलवान बनता है।
    • YOGA के द्वारा आंतरिक शक्ति का विकास होता है।
    • YOGA से ब्लड शुगर का लेवल स्थिर रहता है। ब्लड शुगर घटने व बढने की समस्या नहीं होती है।
    • YOGA कोलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करता है।
    • YOGA ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों को जागृत करता है।
    • YOGA डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की सभी मांसपेशियों का अच्छा विकास व व्यायाम होता है जिससे तनाव दूर होता है अच्छी नींद आती है भूख अच्छी लगती है पाचन तंत्र सही रहता है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। बहुत सी स्टडीज में साबित यह हो चुका है कि अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर व डायबिटीज के मरीज योग द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ होते हैं।
    • कुछ योगासनों और मेडिटेशन के द्वारा अर्थराइटिस, कमर में दर्द, घुटनों में दर्द जोड़ों में दर्द आदि दर्द मे काफी सुधार होता है। गोली-दवाइयों की आवश्यकता कम हो जाती है।
    • YOGA बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद है। योगासनों के नित्य अभ्यास से बच्चों में मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक शक्ति का विकास होता है। जो बच्चे पढ़ाई में कमजोर है वह भी मेडिटेशन के द्वारा पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ हो सकते है अपनी एकाग्रता में सुधार कर सकते है।

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    FAQ

    Ques 1. योग की परिभाषा क्या है?
    Ans. हमारे सनातन धर्म,बौद्ध धर्म और महर्षियों के अनुसार YOGA की परिभाषा कुछ इस प्रकार है।

    1. महर्षि पतंजलि के अनुसार

    • “योगश्चित: वृत्ति निरोध:”÷ अर्थात अभ्यास वैराग्य द्वारा चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है
    • यहां चित्त की वृत्तियों से तात्पर्य है। हमारी कामना, लोभ, वासन आदि।

    2. महर्षि वेदव्यास के अनुसार

    •  महर्षि वेदव्यास के अनुसार “योग का अर्थ समाधि” है।

    3. भागवत गीता के अनुसार

    • “तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्”
    • योगः कर्मसु कौशलम्”÷ अर्थात् योग से ही कर्मों में कुशलता है अर्थात् कर्म बंधनों से छूटने का उपाय है।

    4. बौद्ध धर्म के अनुसार

    • “कुशल चितैकाग्गता योगः”÷ अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।

    Ques 2. योग क्या है योग कितने प्रकार के होते हैं?
    Ans. YOGA क्या है :-

    • YOGA शब्द “युज” से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है- एकजुट करना या एकीकृत करना
    • YOGA एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है। ‘योग’ शब्द तथा इसकी प्रक्रिया और धारणा हिन्दू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बन्धित है।

    YOGA के प्रकार

    • YOGA 6 प्रकार के हैं :-
    1. कर्मयोग
    2. ज्ञानयोग
    3. भक्तियोग
    4. राजयोग
    5. हठयोग
    6. कुंडलिनी/लययोग
    • इसके अतिरिक्त बहिरंगयोग, मंत्रयोग व स्वरयोग आदि योगो के अनेक आयामों की भी चर्चा की जाती है, लेकिन मुख्यत: 6 प्रकार के ही YOGA माने गए हैं।

    Ques 3. योग का अर्थ क्या है?
    Ans. YOGA का अर्थ :-

    • YOGA का अर्थ व्यायाम व आसन मात्र नहीं है आसन व व्यायाम तो YOGA का एक भाग है YOGA का रूप तो बहुत विस्तृत है किंतु वर्तमान में लोगों ने YOGA को केवल आसन व प्राणायाम से जोड़ दिया है वास्तव में जो योगी है वह केवल शरीर पर ध्यान नहीं देते अपितु अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके ईश्वर के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं और ईश्वर में ध्यान लगाते हैं
    • YOGA का प्रथम अनुभव शरीर से ही संबंधित है इसका प्रथम कार्य शरीर को स्वस्थ बनाना है YOGA आरंभ करने के कुछ दिन पश्चात व्यक्ति अपने आप को रोगमुक्त और ऊर्जावान अनुभव करने लगता है।
    • इसके पश्चात YOGA के माध्यम से मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है अर्थात व्यक्ति की भावनाओं और विचारों की शुद्धि होना आरंभ होती है YOGA के इस अनुभव से मस्तिक से अवसाद, चिंता, नकारात्मक विचार आदि पर नियंत्रण करना संभव हो जाता है।

    Ques 4. योग की शुरुआत कब हुई?
    Ans. YOGA का इतिहास :-

    • YOGA की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। और इसकी उत्‍पत्ति हजारों वर्ष पहले हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्‍यता आरम्भ हुई है तभी से YOGA किया जा रहा है। अर्थात प्राचीनतम धर्मों या आस्‍थाओं के जन्‍म लेने से पहले ही YOGA का जन्म हो चुका था। YOGA विद्या में शिव को “आदि योगी” तथा “आदि गुरू” माना जाता है।
    • भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही YOGA का प्रारम्भ माना जाता है। बाद में कृष्ण, महावीर और बुद्ध ने इसे अपनी तरह से विस्तारित किया। इसके पश्चात पतञ्जलि ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया। इस रूप को ही आगे चलकर सिद्धपंथ, शैवपंथ, नाथपंथ, वैष्णव और शाक्त पंथियों ने अपने-अपने तरीके से विस्तारित किया।
    • YOGA से सम्बन्धित सबसे प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्य सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त वस्तुएँ से हुए हैं जिनकी शारीरिक मुद्राएँ और आसन उस काल में YOGA के अस्तित्व के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। YOGA के इतिहास पर यदि हम दृष्टि डालें तो इसके प्रारम्भ या अन्त का कोई प्रमाण नही मिलता, लेकिन YOGA का वर्णन सर्वप्रथम वेदों में मिलता है और वेद ग्रंथ सबसे प्राचीन साहित्य माने जाते है। YOGA की शुरुआत भारत में हुई थी।

    Ques 5. योग के नियम क्या है?
    Ans. YOGA के नियम :-

    अगर आप इन कुछ सरल नियमों का पालन करेंगे, तो अवश्य ही आपको YOGA अभ्यास का पूरा लाभ मिलेगा।

    • किसी गुरु के निर्देशन में YOGA अभ्यास आरम्भ करें।
    • सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त योग का सही समय है।
    • YOGA करने से पहले स्नान ज़रूर करें।
    • YOGA खाली पेट करें और योग करने के 2 घंटे पहले कुछ ना खायें।
    • YOGA आरामदायक सूती कपड़े पहन के करे
    • तन की तरह मन भी स्वच्छ होना चाहिए YOGA करने से पहले सब बुरे ख़याल दिमाग़ से निकाल दें।
    • किसी शांत वातावरण और साफ जगह में YOGA अभ्यास करें।
    • अपना पूरा ध्यान अपने YOGA अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।
    • YOGA अभ्यास धैर्य और दृढ़ता से करें।
    • अपने शरीर के साथ जबरदस्ती बिल्कुल ना करें।
    • धीरज रखें। YOGA के लाभ महसूस होने मे वक़्त लगता है।
    • निरंतर YOGA अभ्यास जारी रखें।
    • YOGA करने के 30 मिनिट बाद तक कुछ ना खायें। 1 घंटे तक न नहायें।
    • प्राणायाम हमेशा आसन अभ्यास करने के बाद करें।
    • अगर कोई मेडिकल तकलीफ़ हो तो पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह करें।
    • अगर तकलीफ़ बढ़ने लगे या कोई नई तकलीफ़ हो जाए तो तुरंत YOGA अभ्यास रोक दें।
    • योगाभ्यास के अंत में हमेशा शवासन करें।

    Ques 6. योग के उद्देश्य क्या हैं?
    Ans. YOGA के उद्देश्य :-

    • तनाव से मुक्त जीवन
    • मानसिक शक्ति का विकास करना
    • प्रकृति के विपरीत जीवन शैली में सुधार करना
    • निरोगी काया
    • रचनात्मकता का विकास करना
    • मानसिक शांति प्राप्त करना
    • सहनशीलता में वृद्धि करना
    • नशा मुक्त जीवन
    • वृहद सोच
    • उत्तम शारीरिक क्षमता का विकास करना

    Ques 7. योग के महत्व क्या हैं?
    Ans. YOGA के महत्व :-

    • रोज सुबह उठकर YOGA का अभ्यास करने से अनेक फायदे हैं YOGA मन, मस्तिष्क, ध्यान और शरीर के सभी अंगो का एक संतुलित वर्कआउट है जो आपके सोच-विचार करने की शक्ति व मस्तिष्क के कार्यों को बढ़ाता है तनाव को कम करता है।
    • YOGA मन को अनुशासित करता है।
    • जहां जीम व एक्सरसाइज आदि से शरीर के किसी विशेष अंग का विकास या व्यायाम हो पाता है वही YOGA करने से शरीर के समस्त अंगों का,ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों, ग्रंथियों का विकास और व्यायाम होता है जिससे शरीर के समस्त अंग सुचारू रूप से कार्य करते हैं।
    • प्रतिदिन YOGA करने से शरीर निरोगी बनता है।
    • YOGA का प्रयोग शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए हमेशा से होता आ रहा है आज की चिकित्सा शोधों व डॉक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि YOGA शारीरिक और मानसिक रूप से मानव जाति के लिए वरदान है।
    • YOGA एकाग्रता को बढ़ाता है। प्रतिदिन योग करने से हमारी अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता बढ़ती है।
    • प्रतिदिन योगासन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है शरीर स्वस्थ, निरोगी और बलवान बनता है।
    • YOGA के द्वारा आंतरिक शक्ति का विकास होता है।
    • YOGA से ब्लड शुगर का लेवल स्थिर रहता है। ब्लड शुगर घटने व बढने की समस्या नहीं होती है।
    • YOGA कोलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करता है।
    • YOGA ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों को जागृत करता है।
    • YOGA डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की सभी मांसपेशियों का अच्छा विकास व व्यायाम होता है जिससे तनाव दूर होता है अच्छी नींद आती है भूख अच्छी लगती है पाचन तंत्र सही रहता है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। बहुत सी स्टडीज में साबित यह हो चुका है कि अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर व डायबिटीज के मरीज YOGA द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ होते हैं।
    • कुछ योगासनों और मेडिटेशन के द्वारा अर्थराइटिस, कमर में दर्द, घुटनों में दर्द जोड़ों में दर्द आदि दर्द मे काफी सुधार होता है। गोली-दवाइयों की आवश्यकता कम हो जाती है।
    • YOGA बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद है। योगासनों के नित्य अभ्यास से बच्चों में मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक शक्ति का विकास होता है। जो बच्चे पढ़ाई में कमजोर है वह भी मेडिटेशन के द्वारा पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ हो सकते है अपनी एकाग्रता में सुधार कर सकते है।

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