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    वज्रासन करने का तरीका और 15 फायदे – Method and benefits of Vajrasana in Hindi

    वज्रासन

    हेलो दोस्तों INDIA TODAY ONE blog में आपका स्वागत है। इस आर्टिकल में हम वज्रासन योगासन के बारे में जानकारी देंगे।

    योग भारत की प्राचीन विधा है। इतिहास की दृष्टि से यह व्यक्त करना अत्यंत कठिन होगा कि विश्व में योग विद्या का आविर्भाव कब, कैसे और कहाँ से हुआ। यदि हम प्राचीन ग्रंथों पर नज़र डालें तो योग विद्या का उल्लेख वेदों और जैन धर्म के ग्रंथों में मिलता है। अतः कह सकते हैं कि योग विद्या की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। महान योग गुरुओं और तपस्वियों ने योग को हजारों साल की कठिन तपस्या के बाद निर्मित किया है। आज शरीर और मन की ऐसी कोई भी समस्या नहीं है जिसका हल योग के पास न हो। इस ज्ञान को अब वैज्ञानिक मान्यता भी मिल चुकी है। 

    आज लोगों का मानना है कि महर्षि पतंजलि ने योग का निरूपण किया जबकि योग के प्रथम गुरु भगवान शिव ही हैं। महर्षि पतंजलि ने तो केवल अष्टांग योग का प्रतिपादन किया जो कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि के रूप में गृहीत है।

    योगाभ्यास के दौरान शरीर को कई बार आध्यात्मिक अनुभव भी होते हैं। ये अनुभव किसी भी इंसान के जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। योग आपके जीवन को नई दिशा देता है, योग आपको खुद से मिलाने की ही एक यात्रा है। 

    भारत के महान योग गुरुओं और तपस्वियों ने मनुष्य के जीवन में संतुलन बनाने के लिए कई योगासनों का निर्माण किया है। इन्हीं योगासनों में से एक प्रमुख आसन वज्रासन हैं। 

    इसलिए, इस लेख में हम वज्रासन के बारे में जानेंगे। वज्रासन क्या है, वज्रासन करने का सही तरीका, वज्रासन करने के फायदे और सावधानियों के बारे में जानकारी देंगे। और साथ में हम योग करने के नियम, योग के प्रमुख उद्देश्य और योग का हमारे जीवन में क्या महत्व हैं इसके बारे में भी जानेंगे।

    वज्रासन का शाब्दिक अर्थ।

    • वज्र का अर्थ होता है कठोर। क्योंकि इसे करने से शरीर मजबूत, दृढ़ और स्थिर बनता है। यह आसन सरल होते हुए भी कल्पवृक्ष के समान है। इसीलिए इस आसन को वज्रासन कहते है।

    वज्रासन करने का सही तरीका।

    वज्रासन करने की विधि।

    वज्रासन

    विधि।

    • सर्वप्रथम अपने आसन पर शांतचित्त व प्रसन्न मन से दोनों पैरों के घुटनों को मोड़कर इस प्रकार बैठें कि दोनों पैरों के तलवों के बीच नितंब (hip) एवं एड़ियों के बीच मलद्वार (anus) और private parts आ जाएँ। 
    • अभ्यास करते समय ध्यान रखें कि दोनों पैरों के अंगूठे एक-दूसरे को परस्पर स्पर्श करते रहें।
    • इसके पश्चात दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर ज्ञानमुद्रा बैठें। 
    • अभ्यास करते समय याद रखें मेरुदण्ड, पीठ एवं गर्दन को एकदम सीधा रखना है, जिससे लाभ अधिक मिलेंगे।

    ध्यान।

    • इस आसन को करते समय अपना ध्यान समस्त चक्रों पर से केंद्रित करें। किंतु विशेष रुप से मणिपूरक चक्र पर अपना ध्यान केंद्रित करें।

    श्वासक्रम।

    • वज्रासन का अभ्यास करते समय प्राणायाम भी कर सकते हैं।

    समय।

    • इस आसन को सबसे पहले 10 second करें, फिर 20 second तक बढ़ाएँ। कुछ दिन तक लगातार अभ्यास करने से आप 1 minute तक वज्रासन करने लगेंगे।
    • भोजन के तुरंत बाद इस आसन को 10-15 minute तक करने से भोजन का पाचन जल्दी होता है।
    • वैसे दैनिक योगाभ्यास में 1-3 minute तक वज्रासन का अभ्यास करना चाहिए।

    दिशा।

    • अभ्यास करते समय अपना मुख पूर्व या उत्तर : तरफ रखें।

    मंत्रोच्चारण।

    • वज्रासन का अभ्यास करते समय अपने गुरु द्वारा प्रदत्त या अपने इष्ट देव या के मंत्र का जाप करें।

    वज्रासन का अभ्यास करने के लिए इस वीडियो की मदद लें।

    वज्रासन करने के फायदे।

    वज्रासन

    वज्रासन का नियमित अभ्यास करने के फायदे। 

    • जो व्यक्ति वज्रासन का प्रतिदिन अभ्यास करता है उसका शरीर बुढ़ापे की अवस्था में भी वज्र के समान रहेगा।
    • यह एकमात्र ऐसा आसन है जिसे खाना खाने के बाद किया जाता है। भोजन करने के तुरंत बाद 10-15 minute तक वज्रासन का अभ्यास करने से भोजन जल्दी पचने लगता है और कब्ज, एसिडिटी, पेट में गैस बनना, अपचय, अफारा, पेट दर्द होना आदि से छुटकारा मिलता है।
    • यह हमारे श्रोणी प्रदेश (pelvic area), प्रजनन अंग (reproductive organs) और पाचन तंत्र (Digestive System) के अंगों में रक्त संचार को सुचारु कर उन्हें सुदृढ़ बनाता है।
    • पाचन तंत्र (Digestive System) को स्वस्थ रखने के लिए यह एक बेहतरीन योगासन है। वज्रासन का अभ्यास करने से पेट से सम्बंधित लगभग सभी प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। जैसे :- कब्ज, एसिडिटी, पेट में गैस बनना, अपचय, अफारा, पेट दर्द होना, अल्सर आदि।

    अल्सर :- अल्सर एक प्रकार के घाव होते हैं जो पेट, आहारनाल या आँतों की अंदरूनी सतह पर विकसित हैं। पेट में क्षत या छाले होने को चिकित्सकीय भाषा में अल्सर कहते हैं। जिस जगह पर अल्सर होता है उसके आधार पर इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे पेट में होने वाले अल्सर को ‘gastric ulcer’ कहा जाता है, उसी तरह छोटी आंत के अगले हिस्से में होने वाले अल्सर को ‘duodenal ulcer’ कहा जाता है।

    • सुषुम्ना का द्वार खोलता है। सुषुम्ना नाड़ी का सम्बंध सहस्रार चक्र, मस्तिष्क व प्राणवायु से होता है। सुषुम्ना नाड़ियों में सबसे मुख्य है। यह नाड़ी मुख्यतः आम इंसानों की सोई रहती है।
    • यह आसन वायु संबंधी रोग के लिए अति लाभप्रद आसान है। वायु-विकार से उत्पन्न सिरदर्द के लिए यह रामबाण है। 
    • वज्रासन में बैठने से घुटने, जांघ और पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव लगता हैं जिसके परिणाम स्वरूप यह मांसपेशियां स्वस्थ व मजबूत बनती है।
    • गठिया, साइटिका, फेफड़ों के रोग, अतिनिद्रा, मांसपेशियों का कमजोर होना और हृदय रोग ऐसी समस्याओं में वज्रासन का नियमित रूप से अभ्यास करने से राहत मिलती हैं।
    • यह आसन प्रजनन प्रणाली को सशक्त बनाता है। महिलाओं की मासिक धर्म सम्बंधित समस्याओं को दूर करता है।
    • वज्रासन का अभ्यास करने से मेरुदंड अर्थात रीड की हड्डी स्वयं ही संभावित रूप से सीधी हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप मस्तिष्क में रक्त का संचार (blood circulation) अच्छे प्रकार से होता हैं। 
    • कमर के लिए यह एक अच्छा व्यायाम है नियमित रूप से वज्रासन अभ्यास करने से कमर दर्द के साथ ही साइटिका की  समस्या से भी राहत मिलती है। 

    कटिस्नायुशूल (sciatica) :- sciatic nerve आपकी रीढ़ की हड्डी से शुरू होकर आपके कूल्हों से लेकर पैरों तक जाती है। यह मानव शरीर की सबसे महत्वपूर्ण तंत्रिकाओं में से एक है। आमतौर पर यह दर्द लोगों को 30 साल के बाद ही होता है। sciatic nerve में हुई समस्या से जूझ रहे मरीजों को कमर दर्द, पैरों में सुन्नापन आना या दर्द का अनुभव होना आदि।साइटिका को कटिस्नायुशूल के नाम से भी जाना जाता है।

    • हर्निया और बवासीर में लाभदायक है। 

    हार्निया :- जब आपके पेट की मसल्स कमजोर हो जाती है, और मांसपेशी या ऊत्तक में छेद के माध्यम से कोई अंग उभरकर बाहर की तरफ आने लगते है, तो उसे हर्निया कहते हैं। हर्निया की बीमारी सामान्य रूप से पेट में होती है, लेकिन यह नाभी, जांघ के उपरी हिस्से या कमर के आस-पास कही भी हो सकता है।

    • आत्म सुधार (self-improvement) हेतु हितकारी आसन है।

    सावधानियां।

    • घुटनों के दर्द से पीड़ित व्यक्ति इस आसन का अभ्यास न करें।
    • अपनी क्षमता से अधिक देर तक या ज़बर्दस्ती न बैठें।
    • अगर आप के घुटनों में दर्द हें तो पहले पवनमुक्तासन संबंधी क्रियाओं को करें।
    • साइटिका और कमर के तीव्र दर्द से पीड़ित व्यक्ति धैर्यपूर्वक अभ्यास करें।

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    योग के नियम एवं सावधानियां

    अगर आप इन कुछ सरल नियमों का पालन करेंगे, तो अवश्य ही आपको योग अभ्यास का पूरा लाभ मिलेगा।

    योगाभ्यास का क्रम

    • किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की देख-रेख में ही योगासन एवं योग की क्रियाओं का अभ्यास आरंभ करना चाहिए।
    • किसी योग शिक्षक की देख रेख में ही मुश्किल योगासनों का अभ्यास करें।
    • किसी भी योगासन को करें, परंतु पुनः मूल अवस्था में लौटते समय क्रिया का क्रम विपरीत ही होना चाहिए।
    • योगासन व योग की क्रियाओं का अभ्यास करते समय संपूर्ण ध्यान अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।
    • योग स्व-अर्थ (self-meaning) की क्रिया है अर्थात् जीतना ध्यान पूर्वक अभ्यास करेंगे उतना ही अच्छा लाभ मिलेगा।
    • योगाभ्यास करते समय इस बात का ध्यान रखें की जो योगासनों व योग क्रियाओं की समय-सीमा और गति तय है। उसी अनुपात में योगाभ्यास करें, अन्यथा लाभ की जगह हानि भी हो सकती हैं। 
    • अष्टांग योग के अंग :- यम नियम के पालन पर विशेष ध्यान दें।
    • किसी भी योगासन व योग की क्रियाओं को एकदम से नहीं करना चाहिए। पहले आसान व हल्के व्यायाम, सूक्ष्म आसन, स्थूल आसन या पवनमुक्तासन से संबंधित आसनों को करें ताकि शरीर की जकड़न समाप्त हो और शरीर नरम बने एवं मांसपेशियों में लचीलापन आए। 
    • किसी भी आसन को करने के लिए जबर्दस्ती न करें। प्रतिदिन योगासनों का अभ्यास करने से आसन स्वतः ही सरल होने लगते है।
    • योगासन या योग की किसी भी क्रिया के अंत में हमेशा शवासन करें। शवासन करने से अभ्यास क्रिया में आया हुआ किसी भी प्रकार का तनाव दूर होकर प्रसन्नता का एहसास होता है।
    • अगर कोई आसन सामने की तरफ झुक कर करने वाला है तो थोड़े विश्राम के बाद पीछे की तरफ झुकने वाला आसन करें।
    • प्राणायाम हमेशा आसन अभ्यास करने के बाद करें।
    • अगर कोई मेडिकल तकलीफ़ हो तो पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह करें।

    स्नान

    • योगाभ्यास करने से पहले स्नान ज़रूर करें। और योगाभ्यास करने के बाद 1 घंटे तक न नहायें।
    • योगाभ्यास से पूर्व एवं योगाभ्यास के बाद स्वच्छ एवं शीतल जल से स्नान करें (ऋतु एवं अवस्था अनुसार)।

    वस्त्र

    • योगासन करते समय ज्यादा टाइट कपड़े न पहनें टाइट कपड़े पहनकर योगासन करने में दिक्कत आती है। 
    • योगाभ्यास के समय ढीले-ढाले, आरामदायक, सूती एवं सुविधाजनक वस्त्रों का ही प्रयोग करें।
    • पुरुष साधकों को योगाभ्यास के समय कच्छा या लंगोट अवश्य पहनना चाहिए।
    • आसन के लिए कंबल या दरी का प्रयोग करें।

    स्थान

    • योगाभ्यास के लिए स्थान साफ़-सुथरा और मन को प्रसन्न करने वाला शांत वातावरण होना चाहिए। (जैसे बाग-बगीचे)
    • यदि आप कमरे में योगाभ्यास कर रहे हों तो खिड़की एवं दरवाजे खोल लें।
    • योगाभ्यास का स्थान समतल होना चाहिए। उबड़-खाबड़ न हो। 

    ध्यान

    • योगासन व योग से संबंधित क्रियाओं को करते समय मन को चिंता, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, भय, अहंकार, प्रतिशोध की भावना आदि उद्वेगों से पूर्णतः मुक्त रखें।
    • तन की तरह मन भी स्वच्छ होना चाहिए योग करने से पहले सब बुरे ख़याल दिमाग़ से निकाल दें। और अपना पूरा ध्यान अपने योग अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।
    • योग अभ्यास धैर्य और दृढ़ता से करें।
    • धीरज रखें और निरंतर योग अभ्यास जारी रखें योग के लाभ महसूस होने मे वक़्त लगता है।
    • वह रोग जिसके लिए आप योग क्रियाएं कर रहे हैं, अभ्यास करते समय उसके लिए सकारात्मक चिंतन करें कि वह रोग ठीक हो रहा है।

    श्वासक्रम 

    • किसी भी योगासन या योग की क्रिया को करते समय श्वास-प्रश्वास के प्रति सजगता बनाए रखें।
    • योगाभ्यास के समय श्वास हमेशा नासिका द्वार से ही भरें, मुख से नहीं।
    • प्रत्येक योगासन का अपना एक श्वास क्रम होता है। उसका अवश्य ध्यान रखें।

    समय

    • योगाभ्यास के लिए प्रातः सूर्योदय का समय अच्छा माना जाता है।
    • प्रातः सूर्योदय के समय सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा हमें नवीन ताकत देती है क्योंकि वह ऊर्जा जीवन को संचार प्रदान करने वाली होती है।
    • प्रातःकाल सूर्योदय के समय योगाभ्यास करने से व्यक्ति दिनभर अपने आप को तरोताज़ा और स्फूर्ति महसूस करता है। अतः वह दिनभर प्रसन्नचित्त होकर प्रत्येक कार्य करता है।
    • निश्चित समय और निश्चित स्थान पर योगाभ्यास अधिक प्रभावशाली एवं लाभप्रद होता है।
    • योगाभ्यास करते समय इस बात का ध्यान रखें की जो योगासनों व योग क्रियाओं की समय-सीमा और गति तय है। उसी अनुपात में योगाभ्यास करें, अन्यथा लाभ की जगह हानि भी हो सकती हैं। 

    दिशा

    • प्रार्थना आदि करते समय उत्तर-पूर्व दिशा का चयन करें।
    • बैठकर किए जाने वाले योगासनों में मुख की दिशा उत्तर या पूर्व की और रखें। 
    • लेटकर किए जाने वाले योगासनों में पैरों की दिशा उत्तर या पूर्व की और रखें। 
    • खड़े होकर किए जाने वाले आसनों में मुख पूर्व की तरफ़ रखें।
    • दिशा का महत्त्व इसलिए भी है कि इससे हमारी चेतना ऊर्ध्वमुखी होती है। एवं योगासनों के साथ-साथ कई लाभ स्वतः प्राप्त हो जाते हैं।

    नेत्र

    • यदि आप ने योग करना अभी प्रारंभ किया है तो प्रारंभ में नेत्र बंद न करें। योगासनों का अभ्यास हो जाने के बाद ही नेत्रों को बंद रखें, परंतु मन को निष्क्रिय और चंचल न होने दें।
    • नेत्रों को बंद रखते हुए भी योगासन व योग की क्रियाओं के प्रति मस्तिष्क को सजग रखें। अपना पूरा ध्यान अपने योग अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।

    आहार

    • शरीर को फुर्तीला, चुस्त-दुरुस्त और सुंदर बनाने के लिए जितना महत्त्व हम योग को देते हैं, उतना ही महत्त्व हमें आहार को भी देना चाहिए।
    • योगाभ्यास से कुछ समय पहले एक ग्लास ठंडा एवं ताजा पानी पी सकते हैं। यह सन्धि स्थलों का मल निकालने में अत्यंत सहायक होता है।
    • योगासनों के अभ्यास से पहले मूत्राशय एवं आंतें रिक्त होना चाहिए।
    • साधक को बहुत ज़्यादा खट्टा, तीखा, तामसी, बासा एवं देर से पचने वाले आहार का सेवन नहीं करना चाहिए।
    • साधक को तामसिक भोजन जैसे अंडा, मछली, मांस आदि का त्याग कर देना चाहिए। क्योंकि “जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन”।
    • इस बात को आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारा भोजन सात्विक, शाकाहारी, शुद्ध, ताजा एवं बिना देर से पचने वाला नहीं होना चाहिए। बहुत ज़्यादा खट्टा, तीखा, तामसी, बासा एवं देर से पचने वाला भोजन हमारे पाचन तंत्र को प्रभावित करते। जिससे हमारा स्वास्थ्य बिगड़ता है।
    • साधक को नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। (जैसे :- शराब, गांजा, भांग, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट, आदि)
    • योगासन व योग की क्रिया खाली पेट करें और भोजन करने के कम से कम 4-5 घंटे बाद ही योगाभ्यास क्रिया करें। एवं योग करने के 30 मिनिट बाद तक कुछ ना खायें। 
    • यदि किसी को कब्ज़ की शिकायत हो तो किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की देख-रेख में शंखप्रक्षालन की क्रिया करें। 
    • यदि ज्यादा कब्ज की शिकायत ना हो तो योगाभ्यास से यह रोग दूर हो जाता है। किन्तु शखप्रक्षालन की क्रिया वर्ष में कम से कम एक या दो बार अवश्य करनी चाहिए।

    आयु व अवस्था

    • योगाभ्यास के लिए योग में आयु सीमा का कोई निर्धारण नहीं है किन्तु व्यक्ति को अपनी उम्र, अवस्था, अभ्यास आदि समझकर विवेक का उपयोग करना चाहिए।

    रोगी के लिए

    • योगासन व योग से संबंधित क्रियाएँ तो होती ही हैं रोगों को दूर कर एक अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए परंतु रोगी उस योगासन को न करें जिससे उनकी पीड़ा अथवा रोग की तीव्रता बढ़ती हो। जैसे उच्च रक्तचाप के रोगी शीर्षासन या सर्वांगासन आदि न करें।
    • योगाभ्यास के दौरान विशेष बातें का ध्यान रखें।
    • योगासन पूर्णतः विवेक का उपयोग करते हुए ही करें।
    • योगासन करते समय पूर्ण विश्वास, धैर्य और सकारात्मक विचार रखें।
    • योगासन करते समय मन में ईर्ष्या, क्रोध, जलन, द्वेष एवं खिन्नता का भाव ना रखें।
    • नशीले पदार्थों का सेवन ना करें एवं गंदी मानसिकता न रखें।
    • किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की मदद के बिना मुश्किल योगासनों का अभ्यास या आरंभ न करें। किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही मुश्किल योगासनों का अभ्यास करें।
    • गरिष्ठ भोजन, माँसाहार, अत्यधिक वासना एवं देर रात तक जागने जैसी आदतों का त्याग करें।

    योग के प्रमुख उद्देश्य 

    योग के उद्देश्य :-

    • तनाव से मुक्त जीवन
    • मानसिक शक्ति का विकास करना
    • प्रकृति के विपरीत जीवन शैली में सुधार करना
    • निरोगी काया
    • रचनात्मकता का विकास करना
    • मानसिक शांति प्राप्त करना
    • सहनशीलता में वृद्धि करना
    • नशा मुक्त जीवन
    • वृहद सोच
    • उत्तम शारीरिक क्षमता का विकास करना

    योग के लाभ/महत्व

    • रोज सुबह उठकर योग का अभ्यास करने से अनेक फायदे हैं योग मन, मस्तिष्क, ध्यान और शरीर के सभी अंगो का एक संतुलित वर्कआउट है जो आपके सोच-विचार करने की शक्ति व मस्तिष्क के कार्यों को बढ़ाता है तनाव को कम करता है।
    • योग मन को अनुशासित करता है।
    • जहां जीम व एक्सरसाइज आदि से शरीर के किसी विशेष अंग का विकास या व्यायाम हो पाता है वही योग करने से शरीर के समस्त अंगों का, ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों, ग्रंथियों का विकास और व्यायाम होता है जिससे शरीर के समस्त अंग सुचारू रूप से कार्य करते हैं।
    • प्रतिदिन योग करने से शरीर निरोगी बनता है।
    • योग का प्रयोग शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए हमेशा से होता आ रहा है आज की चिकित्सा शोधों व डॉक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि YOGA शारीरिक और मानसिक रूप से मानव जाति के लिए वरदान है।
    • योग एकाग्रता को बढ़ाता है। प्रतिदिन योग करने से हमारी अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता बढ़ती है।
    • प्रतिदिन योगासन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है शरीर स्वस्थ, निरोगी और बलवान बनता है।
    • योग के द्वारा आंतरिक शक्ति का विकास होता है।
    • योग से ब्लड शुगर का लेवल स्थिर रहता है। ब्लड शुगर घटने व बढने की समस्या नहीं होती है।
    • योग कोलेस्ट्रोल की मात्रा को कम करता है।
    • योग ज्ञानेंद्रियों, इंद्रियों को जागृत करता है।
    • योग डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की सभी मांसपेशियों का अच्छा विकास व व्यायाम होता है जिससे तनाव दूर होता है
    • अच्छी नींद आती है भूख अच्छी लगती है पाचन तंत्र सही रहता है।
    • योगासनों के नित्य अभ्यास से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। बहुत सी स्टडीज में साबित यह हो चुका है कि अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर व डायबिटीज के मरीज योग द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ होते हैं।
    • कुछ योगासनों और मेडिटेशन के द्वारा अर्थराइटिस, कमर में दर्द, घुटनों में दर्द जोड़ों में दर्द आदि दर्द मे काफी सुधार होता है। गोली-दवाइयों की आवश्यकता कम हो जाती है।
    • योग बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद है। योगासनों के नित्य अभ्यास से बच्चों में मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक शक्ति का विकास होता है। जो बच्चे पढ़ाई में कमजोर है वह भी मेडिटेशन के द्वारा पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ हो सकते है अपनी एकाग्रता में सुधार कर सकते है

    सारांश

    योग करना अच्छी आदत है। कभी भी जल्दी फायदे पाने के चक्कर में शरीर की क्षमता से अधिक योगाभ्यास करने की कोशिश न करें। योगासनों का अभ्यास किसी भी वर्ग विशिष्ट के लोग कर सकते हैं।
    वज्रासन, इस योगासन के नियमित अभ्यास से शरीर से सम्बंधित बीमारियों को दूर करने में मदद मिलती है। किन्तु हमारी मंत्रणा यही है कि कभी भी किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की मदद के बिना मुश्किल योगासनों का अभ्यास या आरंभ न करें। किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही मुश्किल योगासनों का अभ्यास करें। इसके अलावा अगर कोई गंभीर बीमारी हो तो योगासन का आरंभ करने से पहले डॉक्टर या अनुभवी योगाचार्य की सलाह जरूर लें।

    FAQ

    Ques 1. वज्रासन करने के क्या फायदे  है?
    Ans. वज्रासन का नियमित अभ्यास करने के फायदे। 

    • जो व्यक्ति वज्रासन का प्रतिदिन अभ्यास करता है उसका शरीर बुढ़ापे की अवस्था में भी वज्र के समान रहेगा।
    • वज्रासन एकमात्र ऐसा आसन है जिसे खाना खाने के बाद किया जाता है। भोजन करने के तुरंत बाद 10-15 minute तक वज्रासन का अभ्यास करने से भोजन जल्दी पचने लगता है और कब्ज, एसिडिटी, पेट में गैस बनना, अपचय, अफारा, पेट दर्द होना आदि से छुटकारा मिलता है।
    • वज्रासन हमारे श्रोणी प्रदेश (pelvic area), प्रजनन अंग (reproductive organs) और पाचन तंत्र (Digestive System) के अंगों में रक्त संचार को सुचारु कर उन्हें सुदृढ़ बनाता है।
    • पाचन तंत्र (Digestive System) को स्वस्थ रखने के लिए यह एक बेहतरीन योगासन है। वज्रासन का अभ्यास करने से पेट से सम्बंधित लगभग सभी प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। जैसे :- कब्ज, एसिडिटी, पेट में गैस बनना, अपचय, अफारा, पेट दर्द होना, अल्सर आदि।

    अल्सर :- अल्सर एक प्रकार के घाव होते हैं जो पेट, आहारनाल या आँतों की अंदरूनी सतह पर विकसित हैं। पेट में क्षत या छाले होने को चिकित्सकीय भाषा में अल्सर कहते हैं। जिस जगह पर अल्सर होता है उसके आधार पर इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे पेट में होने वाले अल्सर को ‘gastric ulcer’ कहा जाता है, उसी तरह छोटी आंत के अगले हिस्से में होने वाले अल्सर को ‘duodenal ulcer’ कहा जाता है।

    • सुषुम्ना का द्वार खोलता है। सुषुम्ना नाड़ी का सम्बंध सहस्रार चक्र, मस्तिष्क व प्राणवायु से होता है। सुषुम्ना नाड़ियों में सबसे मुख्य है। यह नाड़ी मुख्यतः आम इंसानों की सोई रहती है।
    • यह आसन वायु संबंधी रोग के लिए अति लाभप्रद आसान है। वायु-विकार से उत्पन्न सिरदर्द के लिए यह रामबाण है। 
    • वज्रासन में बैठने से घुटने, जांघ और पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव लगता हैं जिसके परिणाम स्वरूप यह मांसपेशियां स्वस्थ व मजबूत बनती है।
    • गठिया, साइटिका, फेफड़ों के रोग, अतिनिद्रा, मांसपेशियों का कमजोर होना और हृदय रोग ऐसी समस्याओं में वज्रासन का नियमित रूप से अभ्यास करने से राहत मिलती हैं।
    • यह आसन प्रजनन प्रणाली को सशक्त बनाता है। महिलाओं की मासिक धर्म सम्बंधित समस्याओं को दूर करता है।
    • वज्रासन का अभ्यास करने से मेरुदंड अर्थात रीड की हड्डी स्वयं ही संभावित रूप से सीधी हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप मस्तिष्क में रक्त का संचार (blood circulation) अच्छे प्रकार से होता हैं। 
    • कमर के लिए यह एक अच्छा व्यायाम है नियमित रूप से वज्रासन अभ्यास करने से कमर दर्द के साथ ही साइटिका की  समस्या से भी राहत मिलती है। 

    कटिस्नायुशूल (sciatica) :- sciatic nerve आपकी रीढ़ की हड्डी से शुरू होकर आपके कूल्हों से लेकर पैरों तक जाती है। यह मानव शरीर की सबसे महत्वपूर्ण तंत्रिकाओं में से एक है। आमतौर पर यह दर्द लोगों को 30 साल के बाद ही होता है। sciatic nerve में हुई समस्या से जूझ रहे मरीजों को कमर दर्द, पैरों में सुन्नापन आना या दर्द का अनुभव होना आदि।साइटिका को कटिस्नायुशूल के नाम से भी जाना जाता है।

    • हर्निया और बवासीर में लाभदायक है। 

    हार्निया :- जब आपके पेट की मसल्स कमजोर हो जाती है, और मांसपेशी या ऊत्तक में छेद के माध्यम से कोई अंग उभरकर बाहर की तरफ आने लगते है, तो उसे हर्निया कहते हैं। हर्निया की बीमारी सामान्य रूप से पेट में होती है, लेकिन यह नाभी, जांघ के उपरी हिस्से या कमर के आस-पास कही भी हो सकता है।

    • आत्म सुधार (self-improvement) हेतु हितकारी आसन है।

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