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    वृश्चिकासन करने की विधि, फायदे और सावधानियां – Vrischikasana in Hindi.1

    वृश्चिकासन

    हेलो दोस्तों INDIA TODAY ONE blog में आपका स्वागत है। इस लेख में हम वृश्चिकासन के बारे में जानेंगे। वृश्चिकासन क्या है, वृश्चिकासन करने का सही तरीका, वृश्चिकासन करने के फायदे और सावधानियों के बारे में जानकारी देंगे।

    इस आसन के अभ्यास के दौरान में गर्दन, कंधे, सीना, मेरुदण्ड, पृष्ठभाग और उदर स्थान सभी तने हुए रहते हैं। मानसिक विकारों में यथासंभव लाभ मिलता है। जीवन उत्साह और स्फूर्ति से भर जाता है। कुछ योगाचार्यों का कहना है। कि यह आसन मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालता है। इस आसन के अभ्यास के दौरान  साधक अपने पैरों से अपने सिर को स्पर्श कर या मारकर उसमें से घृणा, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या आदि दूषित भावनाओं को नष्ट करता है। इससे साधक दयावान, विनयशील, और विनम्र बनता है।

    वृश्चिकासन का शाब्दिक अर्थ।

    वृश्चिकासन एक संस्कृत भाषा का शब्द हैं। वृश्चिकासन दो शब्दों से मिलकर बना है। वृश्चिक +आसन जिसमें वृश्चिक का अर्थ बिच्छू है। और आसन का अर्थ होता है मुद्रा। जब बिच्छू डंक मारता है तो अपनी पूँछ को सिर की तरफ़ मोड़ता है। इस कारण इस आसन की आकृति आक्रामक बिच्छू के समान होने के कारण इसका नाम वृश्चिकासन पड़ा है। कुछ योग शिक्षक इस आसन को पूर्ण वृश्चिकासन कहते हैं।

    वृश्चिकासन करने का सही तरीका।

    वृश्चिकासन करने की विधि।

    वृश्चिकासन

    विधि।

    • सर्वप्रथम अपने आसन में घुटने टेककर आगे की ओर झुक कर बैठ जाए।
    • अब ज़मीन पर अपने दोनों हाथों को कोहनी से लेकर हथेलियाँ तक समानांतर रखें। (चित्रानुसार)
    • अब गर्दन और सिर को ऊपर उठाएँ तथा श्वास छोड़ें और पैरों और कमर के भाग को ऊपर उछालते हुए शीर्षासन जैसी स्थिति में पहुँचें।
    • अब संतुलन बनाते हुए कमर के भाग को और पैरों को घुटनों से मोड़ते हुए पंजों को सिर की तरफ़ लाएँ। (चित्रानुसार)
    • अपनी क्षमता अनुसार गर्दन और सिर ऊपर ऊँचा उठाएँ चूँकि यह उच्च अभ्यास का आसन है। अतः सावधानीपूर्वक इस आसन का अभ्यास  करें।
    • मेरुदण्ड को इतना ही मोड़ने की कोशिश करें कि पैरों की एड़ियाँ सिर के ऊर्ध्व भाग को स्पर्श करने लग जाएँ। (चित्रानुसार)
    • इस आसन की अंतिम स्थिति में गर्दन, कंधे, सीना, मेरुदण्ड, पृष्ठभाग और उदर स्थान सभी तने हुए रहते हैं। अतः श्वास क्रिया तेज़ हो जाती है। स्वाभाविक श्वास लेने की कोशिश करें।
    • अपनी क्षमता अनुसार इस मुद्रा रुकें और मूल अवस्था में वापस आ जाएँ।

    श्वास का क्रम/समय।

    • श्वास का क्रम और समय ऊपर विधि में बताया गया है।

    वृश्चिकासन का अभ्यास करने के लिए इस वीडियो की मदद लें।

    वृश्चिकासन करने के फायदे।

    वृश्चिकासन का नियमित अभ्यास करने के फायदे।

    • इस आसन के अभ्यास के दौरान में गर्दन, कंधे, सीना, मेरुदण्ड, पृष्ठभाग और उदर स्थान सभी तने हुए रहते हैं।
    • कंधे, भुजाएँ शक्तिशाली बनती हैं।
    • सीने, मेरुदण्ड और ग्रीवा के रोगों में लाभ मिलता है। कमर लचीली बनती है।
    • पृष्ठभाग के संस्थान सशक्त और स्वस्थ होते हैं।
    • उदर-क्षेत्र के विकार दूर होते हैं एवं पाचन तंत्र (Digestive System) में सुधार होता है। एवं पाचन तंत्र (Digestive System) सक्रिय हो जाता है।
    • यह आसन ओज, तेज और चेहरे की चमक बढ़ाता है। और चेहरे की झुर्रियों को समाप्त कर देता है।
    • मानसिक विकारों में यथासंभव लाभ मिलता है।
    • जीवन उत्साह और स्फूर्ति से भर जाता है।
    • कुछ योगाचार्यों का कहना है। कि यह आसन मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालता है। इस आसन के अभ्यास के दौरान  साधक अपने पैरों से अपने सिर को स्पर्श कर या मारकर उसमें से घृणा, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या आदि दूषित भावनाओं को नष्ट करता है। इससे साधक दयावान, विनयशील, और विनम्र बनता है।

    सावधानियां।

    • high blood pressure, heart patient और मेरुदण्ड से संबंधित विकार हो तो यह आसन न करें।
    • जब तक इस आसन का पूर्ण अभ्यस्त ना हो जाएँ तब तक इस आसन के अभ्यास के दौरान  किसी व्यक्ति का सहारा लें।
    • पीठ के तनाव को कम करने के लिए पश्चिमोत्तानासन या सामने की तरफ़ झुकने वाले आसन करें।

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    सारांश।

    योग करना अच्छी आदत है। कभी भी जल्दी फायदे पाने के चक्कर में शरीर की क्षमता से अधिक योगाभ्यास करने की कोशिश न करें। योगासनों का अभ्यास किसी भी वर्ग विशिष्ट के लोग कर सकते हैं।

    वृश्चिकासन, इस योगासन के नियमित अभ्यास से शरीर से सम्बंधित बीमारियों को दूर करने में मदद मिलती है। किन्तु हमारी मंत्रणा यही है कि कभी भी किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की मदद के बिना मुश्किल योगासनों का अभ्यास या आरंभ न करें। किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही मुश्किल योगासनों का अभ्यास करें। इसके अलावा अगर कोई गंभीर बीमारी हो तो योगासन का आरंभ करने से पहले डॉक्टर या अनुभवी योगाचार्य की सलाह जरूर लें

    FAQs

    Ques 1. वृश्चिकासन करने की विधि?

    Ans. वृश्चिकासन करने की विधि।

    • सर्वप्रथम अपने आसन में घुटने टेककर आगे की ओर झुक कर बैठ जाए।
    • अब ज़मीन पर अपने दोनों हाथों को कोहनी से लेकर हथेलियाँ तक समानांतर रखें। (चित्रानुसार)
    • अब गर्दन और सिर को ऊपर उठाएँ तथा श्वास छोड़ें और पैरों और कमर के भाग को ऊपर उछालते हुए शीर्षासन जैसी स्थिति में पहुँचें।
    • अब संतुलन बनाते हुए कमर के भाग को और पैरों को घुटनों से मोड़ते हुए पंजों को सिर की तरफ़ लाएँ। (चित्रानुसार)
    • अपनी क्षमता अनुसार गर्दन और सिर ऊपर ऊँचा उठाएँ चूँकि यह उच्च अभ्यास का आसन है। अतः सावधानीपूर्वक इस आसन का अभ्यास  करें।
    • मेरुदण्ड को इतना ही मोड़ने की कोशिश करें कि पैरों की एड़ियाँ सिर के ऊर्ध्व भाग को स्पर्श करने लग जाएँ। (चित्रानुसार)
    • इस आसन की अंतिम स्थिति में गर्दन, कंधे, सीना, मेरुदण्ड, पृष्ठभाग और उदर स्थान सभी तने हुए रहते हैं। अतः श्वास क्रिया तेज़ हो जाती है। स्वाभाविक श्वास लेने की कोशिश करें।
    • अपनी क्षमता अनुसार इस मुद्रा रुकें और मूल अवस्था में वापस आ जाएँ।

    Ques 2. वृश्चिकासन करने के क्या फायदे है?

    Ans. वृश्चिकासन का नियमित अभ्यास करने के फायदे।

    • इस आसन के अभ्यास के दौरान में गर्दन, कंधे, सीना, मेरुदण्ड, पृष्ठभाग और उदर स्थान सभी तने हुए रहते हैं।
    • कंधे, भुजाएँ शक्तिशाली बनती हैं।
    • सीने, मेरुदण्ड और ग्रीवा के रोगों में लाभ मिलता है। कमर लचीली बनती है।
    • पृष्ठभाग के संस्थान सशक्त और स्वस्थ होते हैं।
    • उदर-क्षेत्र के विकार दूर होते हैं एवं पाचन तंत्र (Digestive System) में सुधार होता है। एवं पाचन तंत्र (Digestive System) सक्रिय हो जाता है।
    • यह आसन ओज, तेज और चेहरे की चमक बढ़ाता है। और चेहरे की झुर्रियों को समाप्त कर देता है।
    • मानसिक विकारों में यथासंभव लाभ मिलता है।
    • जीवन उत्साह और स्फूर्ति से भर जाता है।
    • कुछ योगाचार्यों का कहना है। कि यह आसन मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डालता है। इस आसन के अभ्यास के दौरान  साधक अपने पैरों से अपने सिर को स्पर्श कर या मारकर उसमें से घृणा, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या आदि दूषित भावनाओं को नष्ट करता है। इससे साधक दयावान, विनयशील, और विनम्र बनता है।

     

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