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    भैरवासन (दो प्रकार) करने की विधि, फायदे और सावधानियां – Bhairavasana in Hindi.1

    भैरवासन

    हेलो दोस्तों INDIA TODAY ONE blog में आपका स्वागत है। इस लेख में हम भैरवासन के दोनों प्रकार के बारे में जानेंगे। भैरवासन क्या है, भैरवासन करने का सही तरीका, भैरवासन करने के फायदे और सावधानियों के बारे में जानकारी देंगे।

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) का शाब्दिक अर्थ।

    • काल भैरवासन संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है काल+भैरव+आसन जिसमें पहला शब्द “काल” का अर्थ “विनाश या समय” से है।  दुसरा शब्द “भैरव” का अर्थ “भयानक या उग्र।” से है। और तीसरा शब्द “आसन” जिसका अर्थ होता है। “मुद्रा”। यह भगवान शिव के आठ रूपों में से एक है।

    भैरवासन प्रथम प्रकार

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) करने का सही तरीका।

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) करने की विधि।

    भैरवासन

    विधि।

    • इस आसन को करने की कई विधियाँ हैं। यह आसन कालभैरव जी का है। जो कि भगवान शिव के आठ रूपों में से एक है। भारत में कालभैरव जी की तरह-तरह की मुद्राओं वाली प्रतिमाएँ मिलती हैं।
    • यहां उन्हीं की एक मुद्रा कौन दर्शाया गया है।
    • सर्वप्रथम अपने आसन पर सीधे खड़े हो जाएँ। 
    • दोनों पैरों के बिच लगभग 1 फ़ीट का अंतर रखें। 
    • पैर चित्रानुसार एक पैर दूसरे पैर के पीछे होना चाहिए। 
    • हाथों को या तो ऊपर कर लें या फिर आगे-पीछे। 
    • बिना पलक झपकाएं सामने की तरफ देखें और जीभ थोड़ी बाहर निकली हुई हो।

    ध्यान।

    • इस आसन  को करते समय अपना ध्यान श्वास की तरफ़ दें और इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात पर ध्यान करें कि समस्त क्रोध बाहर जा रहा है। और आध्यात्मिक आनंद अंदर आ रहा है।

    समय।

    • इस आसन का अभ्यास आप 3 से 5 मिनट तक करें।

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) का अभ्यास करने के लिए इस वीडियो की मदद लें।

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) करने के फायदे।

    भैरवासन (प्रथम प्रकार) का नियमित अभ्यास करने के फायदे।

    • शरीर में दृढ़ता आती है।
    • आँखों की ज्योति बढ़ती है।
    • इसके अभ्यास से क्रोध का भाव समाप्त होता है मन शांत वह आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
    • बच्चों को यह आसन अवश्य करना चाहिए इस आसन के अभ्यास से मन में डर का भाव समाप्त होता हैं। आत्म विश्वास बढ़ता है।
    • साधक के अंदर निर्भयता, निडरता आती है, साहस बढ़ता है।
    • वक्षःस्थल (chest area) चौड़ा व मजबूत होता है।

    भैरवासन द्वितीय प्रकार

     

    भैरवासन (द्वितीय प्रकार) करने का सही तरीका।

    भैरवासन (द्वितीय प्रकार) करने की विधि।

    भैरवासन

    विधि।

    • सर्वप्रथम अपने आसन पर दोनों पैरों को सामने की तरफ फैलाकर बैठ जाएँ।
    • अब बाएँ पैर के टखने को दोनों हाथों से पकड़ें और छाती के पास लाएँ।
    • अब श्वास छोड़ें। छाती और गर्दन को थोड़ा सा आगे झुकाते हुए बाएँ टखने को गर्दन के पीछे रखें। (चित्रानुसार)
    • अब अपने दोनों हाथों को नितम्बों के पास रखें और बाएँ तरफ मुड़ें। तथा दाहिने हाथ को सहारे के लिए बाँईं तरफ रखें।
    • अब दाहिने पैर को तिरछा करें।
    • अब श्वास छोड़ें और दोनों हाथों पर वज़न देते हुए शरीर को ऊपर उठाएँ।
    • अब सामान्य श्वास-प्रश्वास करें।
    • अब श्वास छोड़ें और दाहिने हाथ का सहारा हटाएँ।
    • अब इसी दाहिने हाथ को सीधे आकाश की तरफ़ तान दें। (चित्रानुसार)
    • इस प्रकार शरीर का पूरा भार एवं संतुलन दाहिने पैर और बाएँ हाथ पर रहेगा।
    • अब लगभग 5 से 10 सेकेण्ड इसी अवस्था में रहें व धीमी और गहरी श्वास लें। तथा वापस मूल अवस्था में आते समय अंतःकुंभक करें।
    • अब इसी क्रिया को पैर एवं हाथ बदल कर दोहराएं।

    श्वास का क्रम/समय।

    • श्वास का क्रम और समय ऊपर विधि में बताया गया है।

    भैरवासन (द्वितीय प्रकार) का अभ्यास करने के लिए इस वीडियो की मदद लें।

    भैरवासन (द्वितीय प्रकार) करने के फायदे।

    भैरवासन (द्वितीय प्रकार) का नियमित अभ्यास करने के फायदे।

    • इस आसन के अभ्यास से पूरे शरीर में एक प्रकार की ऊर्जा निर्मित होती है। जिससे हमारे सातों चक्रों (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूरक चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्त्रार चक्र) का उत्थान होता है।
    • अभ्यास से रक्त संचार (blood circulation) तीव्र गति से होने लगता है। जिस हृदय क्षेत्र अशुद्ध रक्त को अवशोषित करने में अधिक सहायक हो जाता है।
    • इस आसन का नियमित अभ्यास करने से शरीर के अन्य अंगों के साथ तंत्रिका तंत्र के कार्यों में भी सुधार करता है। इस योग मुद्रा से तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रक्रिया तेज हो जाती है और रक्त संचार प्रक्रिया में सुधार होता है।
    • यह आसन हमारे शरीर के स्नायु संस्थान, नाड़ी संस्थान को ठीक करता है।
    • इस आसन के अभ्यास से छाती बलिष्ट होती है।
    • श्वास क्रिया में सुधार होता है तथा अधिक परिपूर्ण ढंग से होती है।
    • कूल्हे और उसके आसपास की मांसपेशियां जैसे जांघ आदि की मांसपेशियों में लचीलापन आने लगता है।
    • यह पेट की मांसपेशियों का विस्तार करता है और पाचन संबंधी विकारों को दूर रखता है।

    सावधानियां।

    • extremely high blood pressure और किसी भी प्रकार की शारीरिक जटिलता हो, तो इस आसन का अभ्यास न करें।

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    सारांश।

    योग करना अच्छी आदत है। कभी भी जल्दी फायदे पाने के चक्कर में शरीर की क्षमता से अधिक  योगाभ्यास करने की कोशिश न करें। योगासनों का अभ्यास किसी भी वर्ग विशिष्ट के लोग कर सकते हैं। 

    भैरवासन (दोनों प्रकार), इस योगासन के नियमित अभ्यास से शरीर से सम्बंधित बीमारियों को दूर करने में मदद मिलती है। किन्तु हमारी मंत्रणा यही है कि कभी भी किसी अनुभवी योगाचार्य या योग विशेषज्ञ (yoga Expert) की मदद के बिना मुश्किल योगासनों का अभ्यास या आरंभ न करें। किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही मुश्किल योगासनों का अभ्यास करें। इसके अलावा अगर कोई गंभीर बीमारी हो तो योगासन का आरंभ करने से पहले डॉक्टर या अनुभवी योगाचार्य की सलाह जरूर लें

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